<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7066465544984604668</id><updated>2011-11-27T16:09:51.220-08:00</updated><category term='पवन शर्मा'/><category term='prretish nandi'/><category term='nupur joshi'/><category term='meri aawaz'/><category term='priya sharma'/><category term='कुलदीप शर्मा'/><category term='कोपल'/><category term='meenashi arora'/><category term='sanjay swadesh'/><category term='vk vaidik'/><category term='chetan bhagat'/><category term='saleem khan'/><category term='khushwant singh'/><category term='santosh kumar'/><category term='aashutosh'/><title type='text'>fight4nation</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://fight4nation.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>young voice</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02922572829347384095</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>15</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7066465544984604668.post-7259247370070227847</id><published>2010-04-13T07:48:00.000-07:00</published><updated>2010-04-13T07:50:20.755-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पवन शर्मा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='meri aawaz'/><title type='text'>जम्मू-कश्मीर का खजाना खाली!</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S8SEj4ApqpI/AAAAAAAAAFA/Mv5TbHL-qpA/s1600/PAWAN180+%281%29.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 180px; height: 178px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S8SEj4ApqpI/AAAAAAAAAFA/Mv5TbHL-qpA/s400/PAWAN180+%281%29.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5459634400145287826" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;पवन शर्मा&lt;br /&gt;स्पेशल कोरसपोंडेंट&lt;br /&gt;केन्द्र सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों के डीए को बढा़कर 8 फीसदी कर एक तरफ कर्मचारियों को खुश किया है तो वहीं जम्मू-कश्मीर सरकार ने अपने कर्मचारियों को निराश किया है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा के बजट सत्र में राज्य के वित्त मंत्री अब्दुल रहीम राथर ने जब विधानसभा में बजट रखा तो जम्मू-कश्मीर के अपने कर्मचारियों के लिए कुछ नहीं रखा। वजह साफ है कि जम्मू-कश्मीर का खजाना खाली हो चुका है। गौरतलब है कि राज्य सरकार के कर्मचारी पिछले काफी समय से अपने बकाया वेतन और डीए को बढ़ाने की मांग के लेकर धरना प्रदर्शन करते आ रहे हैं। कई बार इन कर्मचारियों ने सामूहिक हड़ताल भी की लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नही रेंगी।&lt;br /&gt;जम्मू-कश्मीर विधानसभा में जब वित्त मंत्री अब्दुल रहीम राथर यह कह रहे थे कि रियासत की माली हालत कर्मचारियों का बकाया वेतन, एरियर और भत्ता भुगतान करने की इजाजत नहीं देती, तब पौने पांच लाख कर्मचारी सिर पर हाथ रखकर बैठ गए। यह सभी कर्मचारी इस बार सरकार के बजट से कई उम्मीदें लगाए हुए थे कि शायद उनकी मांगों को सरकार नजर में रख कर कोई कदम उठाएगी लेकिन हुआ उसके विपरीत। सभी कर्मचारी अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे हैं और वो भी अब जब केन्द्र सरकार ने केन्द्रीय कर्मचारियों को एक बड़ा तौहफा डीए के रूप में दे दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;13वें वित्त आयोग ने अपनी अनुशंसा में साफ ताकीद की है कि छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद मुलाजिमों को देय 4,200 करोड़ रुपये का तत्काल भुगतान नुकसानदायी होगा। इसमें कोई शक नहीं है कि राज्य की माली हालत इस समय पतली हो चुकी है और इसकी वजह आतंकवाद है जिसके चलते कई उद्योग ठप्प पड़े हैं और पर्यटकों की संख्या में लगातार गिरावट आंकी जा रही है। कृषि क्षेत्र की बदहाली, कश्मीर आने वाले पर्यटकों की कम होती संख्या और भ्रष्टाचार ने केंद्रीय अनुदानों पर राज्य की निर्भरता बढ़ा दी है। चंद दिन पहले पास किए गए राज्य सरकार के बजट में वर्णित आंकड़े बता रहे हैं कि केंद्रीय अनुदान और केंद्रीय करों में हिस्सेदारी ही राज्य सरकार की आय का 70 फीसदी हिस्सा है। खर्च होने वाले एक रुपये में सिर्फ 30 पैसे राज्य सरकार की अपनी कमाई होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकास योजनाओं से लेकर वेतन तक के लिए राज्य सरकार को केंद्र की ओर टकटकी लगाकर देखना पड़ रहा है। हालांकि इसी सबके बीच राज्य सरकार को कई बार बैंकों व बोर्डों से मदद भी मिलती है। साफ तौर पर कहा जाए तो जम्मू-कश्मीर बैंक और माता वैष्णो देवी श्राईन बोर्ड ने कई बार राज्य सरकार के कर्मचारियों को वेतन देने के लिए मदद भी की है। यह बात अलग है कि यह पैसा उधार के तौर पर लिया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले साल केंद्र सरकार ने 5,500 करोड़ रुपये अनुदान दिया था जिससे खर्चा-पानी चलता रहा और विकास बोर्डों की बैठकों में खुले हाथ से मुख्यमंत्री ने पैसे दिए। इस साल यह अनुदान बढ़कर 6,000 करोड़ रुपये हो जाने की उम्मीद है। राज्य की आमदनी बढ़ने के लिए सीधे-सीधे कर थोपने से बचते हुए राज्य सरकार ने वैट में एक फीसदी और सर्विस टैक्स में दो फीसदी का इजाफा कर दिया। जाहिर है, महंगाई और बढ़ेगी। फिलहाल मसला कर्मचारियों की मांगों को तवज्जो देने का है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बजट में खाद और कीटनाशक दवाओं पर से टोल टैक्स हटाया गया है ताकि किसानों को फायदा हो। मगर यह किसी को याद नहीं कि हर साल कंडी क्षेत्र के किसान समय पर और पर्याप्त खाद न मिलने के कारण कराहते हैं। रियासत में 12 फीसदी कृषि भूमि बंजर पड़ी है। पर्यटन क्षेत्र से होने वाली आमदनी में भी गिरावट दर्ज की गई है। साल 1988 में जब आंतकवाद ने सिर नहीं उठाया था, तब कुल 59,938 पर्यटक कश्मीर आए थे। जबकि 2008 में 22,000 पर्यटकों ने ही यहां का रुख किया। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। ताजा बजट में भी होटल, लॉज और गेस्ट हाउसों को एक साल के लिए सेल्स टैक्स में रियायत दी गई है। लेकिन परिणाम आशाजनक होंगे, इसकी कोई गांरटी नहीं। हालांकि सरकार यही कह रही है कि इस बार पर्यटकों को यहां पर लाने के लिए कई योजनाए बनाएगी और पर्यटक स्थलों की देखरेख को ध्यान में रखेगी लेकिन इसके लिए भी बजट चाहिए होगा। साफ तौर पर कहा जाए की माली हालत कब सुधरेगी इसके बारे में कुछ भी पता नहीं लग पा रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7066465544984604668-7259247370070227847?l=fight4nation.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://fight4nation.blogspot.com/feeds/7259247370070227847/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/04/blog-post_13.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/7259247370070227847'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/7259247370070227847'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/04/blog-post_13.html' title='जम्मू-कश्मीर का खजाना खाली!'/><author><name>young voice</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02922572829347384095</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S8SEj4ApqpI/AAAAAAAAAFA/Mv5TbHL-qpA/s72-c/PAWAN180+%281%29.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7066465544984604668.post-33689012063525387</id><published>2010-04-04T00:54:00.000-07:00</published><updated>2010-04-04T01:10:28.957-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='meenashi arora'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='meri aawaz'/><title type='text'>आँखों का नूर, बेनूर कर रहा पानी</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;a href="http://hindi.indiawaterportal.org/"&gt;Report -इंडिया वाटर पोर्टल&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेखक: मीनाक्षी अरोड़ा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S7hHvA2aEjI/AAAAAAAAADg/nKCV8OFSUbs/s1600/0104pani248.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 248px; height: 178px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S7hHvA2aEjI/AAAAAAAAADg/nKCV8OFSUbs/s400/0104pani248.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5456189821566980658" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार के भोजपुर जिले के बीहिया से अजय कुमार, शाहपुर के परशुराम,&lt;div&gt; बरहरा के  शत्रुघ्न और पीरो के अरुण कुमार ये लोग भले ही अलग-अलग इलाकों के हैं, पर इनमें एक  बात कॉमन है, वो है इनके बच्चों की आंखों की रोशनी। इनके साथ ही सोलह और अन्य  परिवारों में जन्में नवजात शिशुओं की आँखों में रोशनी नहीं है। इनकी आँखों में  रोशनी जन्म से ही नहीं है। बिहार के सबसे ज्यादा आर्सेनिक प्रभावित भोजपुर जिले में  पिछले कुछ दिनों के अंदर 50 ऐसे बच्चों के मामले मीडिया में छाये हुए हैं जिनकी  आँखों का नूर कोख में ही चला गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामला प्रकाश में लाने वाले आरा के एक  विख्यात नेत्र विशेषज्ञ हैं- डॉ. एसके केडिया, जो कहते हैं कि &lt;b&gt;"जन्मजात अंधापन  के दो मामले लगभग छह महीने पहले मेरे अस्पताल में आये थे। उस समय मुझे कुछ गलत नहीं  लगा था। लेकिन जब इस तरह के मामले पिछले तीन महीने में नियमित अंतराल पर मेरे पास  आने शुरू हुए तो मुझे धीरे-धीरे यह एहसास हुआ कि यह एक नई चीज है, मेरे 20 साल के  कैरियर में जन्मजात अंधापन के मामले इतनी बड़ी संख्या में कभी नहीं आये थे।“  &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोजपुर के लोग अपने नवजात शिशुओं को लेकर डरे सहमे से अस्पताल पहुँच  रहे हैं। वे नहीं जानते कि उनका नन्हा सा बच्चा देख सकता है कि नहीं। क्योंकि  शुरुआत में बच्चे में इस तरह के कोई लक्षण दिखाई नहीं देते कि वे देख पा रहे हैं या  नहीं। लोग अपना जिला छोड़कर राजधानी पटना के अस्पतालों में भी बच्चों की जांच करा  रहे हैं। वे अपने बच्चों के बारे में किसी समस्या को सार्वजनिक भी नहीं करना चाहते  क्योंकि इससे उनके सामाजिक ताने-बाने पर भी असर पड़ेगा।&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सरकार और उससे जुड़ी  हुई विभिन्न स्वास्थ्य एजेन्सियां इस तरह के मामलों के पीछे का सही कारण पता करने  में पूरी तरह असफल सिद्ध हुई हैं। लोगों को आशंका है कि इसके लिये पानी में मिला  आर्सेनिक जिम्मेदार है। हालांकि भोजपुर के जिला सिविल सर्जन डॉ. केके लाभ कहते हैं  कि &lt;b&gt;मोबाइल फोन के टावरों से निकला इल्क्ट्रोमैग्नेटिक रेडियेशन भी बच्चों के  अंधेपन का कारण हो सकता है। हम लोग सही कारण जानने की कोशिश कर रहे हैं। इस पूरे  मामले में प्रमाणित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है पर एक चीज तो साफ है कि  पर्यावरणीय प्रदूषण ही मुख्य कारण नजर आ रहा है।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी तक देखा गया है कि  आर्सेनिक युक्त जल के निरंतर सेवन से लोग शारीरिक कमजोरी, थकान, तपेदिक, (टीबी.),  श्वाँस संबंधी रोग, पेट दर्द, जिगर एवं प्लीहा में वृद्धि, खून की कमी, बदहजमी, वजन  में गिरावट, आंखों में जलन, त्वचा संबंधी रोग तथा कैंसर जैसी बीमारियों की चपेट में  आ रहे हैं। पर गर्भ में ही बच्चों के अंधा होने की घटनाओं का होना एकदम नया मोड़  है।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e)   भोजपुर जिले का मुख्यालय आरा में आरोग्य संस्था के डॉ मृत्युंजय कुमार  कई आशंकाएं व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि पहला कारण तो वंशानुगत हो सकता है।  दूसरा कारण हो सकता है कि गर्भावस्था के दौरान दी जा रही किसी गलत दवा का असर हो।  तीसरा यह भी हो सकता है कि आर्सेनिक से प्रभाव का यह कोई नया रूप हो, क्योंकि  आर्सेनिक मानव के तंत्रिका तंत्र और स्नायु तंत्र पर असर तो करता ही है।&lt;a onblur=" try="" href="http://4.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S7hHO9U6FrI/AAAAAAAAADY/_9c0DYdOnYY/s1600/sdswd.bmp"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 219px; height: 400px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S7hHO9U6FrI/AAAAAAAAADY/_9c0DYdOnYY/s400/sdswd.bmp" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5456189270865352370" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोजपुर, बिहार में सबसे अधिक आर्सेनिक प्रभावित जिलों में से एक है। पिछले  साल बिहार में कराये गए एक सर्वे में 15 जिलों के भूजल में आर्सेनिक के स्तर में  खतरनाक वृद्धि दर्ज की गई थी। आर्सेनिक प्रभावित 15 जिलों के 57 विकास खंडों के  भूजल में आर्सेनिक की भारी मात्रा पायी गई थी। सबसे खराब स्थिति भोजपुर, बक्सर,  वैशाली, भागलपुर, समस्तीपुर, खगड़िया, कटिहार, छपरा, मुंगेर और दरभंगा जिलों में  है। समस्तीपुर के एक गाँव हराईछापर में भूजल के नमूने में आर्सेनिक की मात्रा 2100  पीपीबी पायी गई जो कि सर्वाधिक है। जबकि भारत सरकार के स्वास्थ्य मानकों के अनुसार  पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा 50 पीपीबी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए और विश्व  स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 10 पीपीबी से ज्यादा नहीं होना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी में  मिला आर्सेनिक बिहार ही नहीं पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तरप्रदेश, पंजाब सहित भारत के  विभिन्न हिस्सों में लोगों की जिंदगी बर्बाद कर रहा है। आज पानी कहीं कैंसर तो कहीं  बच्चों में सेरेब्रल पाल्सी, शारीरिक-मानसिक विकलांगता बाँट रहा है। माँ के गर्भ  में ही बच्चों से आँखे छीन लेने वाले पानी की एक नई सच्चाई हमारे सामने आने वाली  है। हालांकि यह सच अभी आना बाकी है कि असली कारण क्या हैं पर जो भी हैं वे पानी-  पर्यावरण प्रदूषण के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ेंगे। लेकिन इसके साथ यह भी एक  कड़वा सच है कि इन सब के पीछे इन्सान ही जिम्मेदार है।&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;हालात धीरे-धीरे ऐसे होते जा रहे हैं कि धरती की कोख सूनी होती जा रही है। जमीन के  नीचे पानी काफी कम हो गया है और जितना पानी बचा है उसकी एक-एक बूँद लोग निचोड़ लेना  चाहते हैं। धरती की कोख को चीर कर उसके हर कतरे को लोग पी जाना चाहते हैं। सरकारें  और उनकी नीतियां नलकूप, बोरवेल, डीपबोरवेल लगा-लगाकर धरती की कोख से सबकुछ निकाल  लेना चाहती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूनी धरती, सूखी धरती से जब पानी बहुत नीचे चला जाता है तब  पानी कम, खतरनाक केमिकल ज्यादा मिलने लगते हैं। तभी पानी में फ्लोराइड, नाइट्रेट,  आर्सेनिक और अब तो यूरेनियम भी मिलने लगा है। जब पानी आसमान से बरसता है तब उसमें  कोई जहर नहीं होता। जब बारिश का पानी झीलों, तालाबों, नदियों में इकट्ठा होता है तब  हमारे पैदा किए गए कचरे से प्रदूषित हो जाता है। पहले पानी झीलों, तालाबों, नदियों  से धरती में समा जाता था लेकिन अब पानी के लिये सारे रास्ते हम धीरे-धीरे बंद करते  जा रहे हैं। धरती में पानी कम जा रहा है जितना हम डालते हैं उसका कई गुना निकाल रहे  हैं। ऐसे में सूखी होती धरती की कोख अब अमृत रूप पानी नहीं जहर उगल रही है। धरती की  खाली होती कोख जहर उगल रही है और माओं की कोख जन्मना अंधी संतानें। यह नहीं होना  चाहिए, फिर क्या होना चाहिए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;a href="http://hindi.indiawaterportal.org/"&gt;Report -इंडिया वाटर पोर्टल&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7066465544984604668-33689012063525387?l=fight4nation.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://fight4nation.blogspot.com/feeds/33689012063525387/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/04/blog-post_04.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/33689012063525387'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/33689012063525387'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/04/blog-post_04.html' title='आँखों का नूर, बेनूर कर रहा पानी'/><author><name>young voice</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02922572829347384095</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S7hHvA2aEjI/AAAAAAAAADg/nKCV8OFSUbs/s72-c/0104pani248.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7066465544984604668.post-7467629612738130950</id><published>2010-04-01T13:23:00.000-07:00</published><updated>2010-04-01T13:25:56.251-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='aashutosh'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='meri aawaz'/><title type='text'>अमिताभ का बहिष्कार या दिवालियापन</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S7UBE6v7IwI/AAAAAAAAAC4/UXWuaj85b6Y/s1600/ashutoshibn7_180.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 180px; height: 175px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S7UBE6v7IwI/AAAAAAAAAC4/UXWuaj85b6Y/s400/ashutoshibn7_180.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5455267707630592770" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Times New Roman'; font-size: medium; "&gt;&lt;p class="btxt12" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; font-weight: normal; font-size: 12px; color: rgb(0, 0, 0); line-height: 18px; "&gt;[आशुतोष&lt;/p&gt;&lt;p class="btxt12" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; font-weight: normal; font-size: 12px; color: rgb(0, 0, 0); line-height: 18px; "&gt;मैनेजिंग एडिटर&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(255, 255, 255); font-family: Mangal; font-size: 12px; "&gt;&lt;a href="http://khabar.josh18.com/specials/" style="text-decoration: none; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#333333;"&gt;&lt;b&gt;I&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#000000;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#333333;"&gt;&lt;a href="http://khabar.josh18.com/specials/" style="text-decoration: none; "&gt;BN&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://khabar.josh18.com/specials/" style="text-decoration: none; "&gt;7&lt;/a&gt;]&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span"   style="  ;font-family:'Times New Roman';font-size:medium;"&gt;&lt;p class="storytxt" style="margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; font-weight: normal; font-size: 14px; line-height: 22px; "&gt;&lt;b&gt;लोग मुझे&lt;/b&gt; नरेंद्र मोदी का कटु आलोचक कहते हैं। लेकिन पिछले दिनों जब अमिताभ को कांग्रेस ने लपेट लिया तो अच्छा नहीं लगा। सवाल सिर्फ इतना सा है क्या इसी आधार पर कांग्रेस अमिताभ का बहिष्कार कर दे कि वो मोदी के साथ दिखे और गुजरात के ब्रांड एंबेस्डर बने? उनके साथ कांग्रेसी रिश्ता नहीं रखें? ये बात पचती नहीं क्योंकि बच्चन और नेहरू-गांधी परिवार 50 के जमाने से करीब रहे हैं। नेहरू जी हरिवंश राय और तेजी बच्चन की काफी इज्जत करते थे। इंदिरा गांधी के जमाने में तो ये भी कहा जाने लगा था कि अमिताभ का कैरियर ही सरकर की वजह से आसमान पर पहुंचा। लोग ये आरोप लगाते हैं कि इमरजेंसी के समय अमिताभ की फिल्मों पर खास मेहरबानी की गई। '84 में इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव के कहने पर अमिताभ ने हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ इलाहाबाद से चुनाव लड़ा। अमिताभ का जलवा और इंदिरा की मौत से उपजी सहानुभूति का असर था कि बहुगुणा जैसे दिग्गज खेत रहे और फिर कभी उठ नहीं पाये। जीतने के बाद अमिताभ राजीव के और करीब आ गये लेकिन जब बोफोर्स के संदर्भ में अमिताभ का नाम उछला और कांग्रेस ने खुलकर उनका साथ नहीं दिया तो अमिताभ ने राजनीति को अलविदा कह दिया। साथ ही नेहरू के जमाने से चली आ रही दोनों परिवारों की दोस्ती भी खत्म हो गयी।&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 10px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; font-weight: normal; "&gt;राजीव के जाने के बाद दूरियां और बढ़ गईं। अमिताभ का बनारस में दिया गया वो मशहूर बयान अभी भी याद है कि राजा और रंक के रिश्ते में रंक नहीं राजा ये तय करता है कि उसे रिश्ता रखना है या नहीं। उनका इशारा सोनिया की तरफ था और फिर कभी दोनों परिवार करीब नहीं आये। मुसीबत के दिनों में अमर सिंह ने अमिताभ की मदद की, कांग्रेस ने नहीं। ये वो दिन था जब लोग कहते हैं कि अमिताभ खुदकुशी के बारे में भी सोचने लगे थे। ऐसे में अमिताभ अमर सिंह का हाथ पकड़ कर समाजवादी पार्टी के साथ हो लिये। और अमिताभ के बावजूद अमर सिंह और मुलायम सिंह ने सोनिया का मजाक उड़ाने का कोई भी मौका नहीं गंवाया। और अब अमर सिंह समाजवादी पार्टी से बाहर हैं तो अमिताभ अनायास ही मोदी के साथ खड़े दिख गये जिनको सोनिया मौत का सौदागर बता चुकी हैं। ऐसे में ये सोचा जा सकता है कि अमिताभ जाने अनजाने उस राह पर दिखे जो नेहरू-गांधी परिवार के विरोध में है। हालांकि अमिताभ ने इस दौरान कभी भी राजनीति में सक्रिय नहीं रहे, वो एक के बाद एक बेहतरीन फिल्में करते रहे। उनकी पर्सनैलिटी कभी भी राजनीतिक व्यक्ति की नहीं रही और न ही उन्होंने कभी सोनिया और उनके परिवार के खिलाफ कोई टिप्पणी ही की लेकिन गांठ जो बनी रही उसे दरबारियों ने खूब हवा दी। 2004 के बाद के सभी सरकारी आयोजनों से अमिताभ का बहिष्कार किया गया। अमिताभ को फिल्म फेस्टिवल तक से दूर रखा गया।&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 10px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; font-weight: normal; "&gt;ऐसे मे अशोक चव्हाण जब बांद्रा वर्ली सी लिंक मे फंक्शन में अमिताभ के साथ दिखे तभी लग गया अब बवाल होगा। अमिताभ को भी अंदाजा था तभी तो फंक्शन के एक दिन पहले उन्होंने अपने ब्लॉग में लिखा कि कल मैं महाराष्ट्र सरकार के एक कार्यक्रम में जा रहा हूं और मीडिया इसमे भी मीन मेख निकालेगा। मीन मेख निकला लेकिन मीडिया ने नहीं कांग्रेस ने निकाला। कांग्रेस ने साबित करने की कोशिश की कि अमिताभ मोदी के साथ हैं इसलिये अछूत हैं और अशोक चव्हाण का उनके साथ मंच पर रहना गलत है। ये सब बकवास है मोदी के साथ होने को सिर्फ बहाना बनाया गया है। हकीकत मे दोनों परिवारों के बीच बीस सालों से ज्यादा की कटुता ही इस हो-हल्ले का कारण है और एक कमजोर थोड़े अनुभवहीन मुख्यमंत्री को उसकी औकात बतायी गयी है कि ज्यादा मत उछलो, नहीं तो धूल मे मिला दिये जाओगो।&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 10px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; font-weight: normal; "&gt;साथ ही मोदी का नाम लेकर कांग्रेस ने अपने मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति को और पुख्ता किया है। कांग्रेस पिछले दिनों लगातार उत्तर प्रदेश और बिहार के मद्देनजर मुसलमानों को अपनी तरफ लाने की पुरजोर कोशिश में जुटी है। और गुजरात दंगों के कारण कांग्रेस की नजर मे मोदी से बड़ा कोई मुस्लिम विरोधी फिलहाल देश मे है नहीं। और कांग्रेस ने बड़ी चालाकी से अमिताभ के बहाने मुसलमानों को संदेश दिया है कि जिसे वो मौत का सौदागर मानती है उसे वो कतई माफ करने को तैयार नहीं और वो कोई भी आदमी जो मोदी के साथ जुड़ेगा वो भी उनके लिये उतना ही बड़ा अछूत है चाहे वो कितना ही बड़ा शख्स क्यों न हो।&lt;/p&gt;&lt;p style="margin-top: 10px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; font-weight: normal; "&gt;लेकिन क्या कांग्रेस के दरबारी इस सवाल का जबाव देंगे कि अगर अमिताभ अछूत हैं तो क्या गुजरात की वो जनता भी अछूत है जिसने मोदी को मुख्यमंत्री बनाने के लिये वोट दिया। क्या अमिताभ का नियम प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति और उनके उन मंत्रियों पर लागू नहीं होना चाहिये जो मोदी के साथ मंच शेयर करते हैं? क्या उस विधानसभा का भी बहिष्कार नहीं किया जाना चाहिये जहां मोदी जाते हैं और बैठते हैं और जहां कांग्रेस के विधायक मोदी के साथ बहस मे हिस्सा लेते हैं? क्या उस सड़क का, उस बिल्डिंग का कभी निषेध नहीं कर देना चाहिये जहां मोदी रहते और गुजरते हैं? ये पागलपन है। और इसे खत्म होना चाहिये क्योंकि लोकतंत्र मे विचारों और विचारधाराओं का विरोध होना चाहिये, निषेध नहीं। और न ही निषेध होना चाहिये विरोधी विचारों और विचारधाराओं को मानने वालों का। ये लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। ऐसा तानाशाही में होता है। और हिंदुस्तान में तानाशाही नहीं है। इसलिये मोदी का कटु आलोचक होने के बाद भी मैंने कभी मोदी का बहिष्कार नहीं किया लेकिन राजनीति दूसरे तरह का खेल है&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7066465544984604668-7467629612738130950?l=fight4nation.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://fight4nation.blogspot.com/feeds/7467629612738130950/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/04/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/7467629612738130950'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/7467629612738130950'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='अमिताभ का बहिष्कार या दिवालियापन'/><author><name>young voice</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02922572829347384095</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S7UBE6v7IwI/AAAAAAAAAC4/UXWuaj85b6Y/s72-c/ashutoshibn7_180.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7066465544984604668.post-7521859706102209617</id><published>2010-03-24T23:54:00.000-07:00</published><updated>2010-03-24T23:55:57.499-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='chetan bhagat'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='meri aawaz'/><title type='text'>गले में नोटों का अजगर</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6sI1A5MZAI/AAAAAAAAACw/mMJ6rCQ74Tk/s1600/chetan-bhagat1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 288px; height: 224px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6sI1A5MZAI/AAAAAAAAACw/mMJ6rCQ74Tk/s400/chetan-bhagat1.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5452461480728093698" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span"   style="  ;font-family:'Verdana UNICODE MS';font-size:13px;"&gt;&lt;div id="articles_content" style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; color: rgb(0, 0, 0); "&gt;&lt;div class="uni_txt" style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; color: rgb(0, 0, 0); font: normal normal normal 110%/normal Bhaskar_WEB_Intro_Test, Verdana, Arial, sans-serif; line-height: 20px; text-align: left; "&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;‘डैडी, क्या यह कोई सांप है?’, टीवी पर सुश्री मायावती के गले में नोटों की माला की तस्वीरें देखकर मेरे पांच साल के बेटे ने मुझसे पूछा। निश्चित ही वह समाज में मौजूद भौतिकवाद के इस प्रतीक पर कोई गहरी टिप्पणी नहीं कर रहा था। नोटों की वह माला वाकई किसी सांप सरीखी ही दिखाई दे रही थी।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;एक अजगर, जो धीरे-धीरे अपने शिकार का दम घोंट देता है। जिस तरह से सुश्री मायावती एक मानव एटीएम बन गई थीं, उससे धनाढच्य भारतीयों द्वारा अपनी दौलत के प्रदर्शन की मिसालों में नया मुकाम जरूर बनेगा। पैसों का यह सांप तो खैर दूसरे स्तर पर था, लेकिन यह देखने लायक चीज है कि हमारे देश में अमीर लोग किस तरह शादियों और सालगिरहों की पार्टियां आयोजित करते हैं ताकि दुनिया को बता सकें कि ‘उनके पास पैसा है!’ पैसा होने का फायदा ही क्या, अगर आपके नाते-रिश्तेदारों, यार-दोस्तों, पड़ोसियों और यहां तक कि अजनबियों को भी इसके बारे में पता ही न चल सके?&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;मुंबई में कुतुब मीनार से भी ऊंचे एक कांक्रीट टॉवर का निर्माण चल रहा है। इसे कई किलोमीटर दूर से भी देखा जा सकेगा। यह एक व्यावसायिक घराने का आशियाना होगा। मैं जन्मदिन की एक ऐसी पार्टी के बारे में जानता हूं, जिसमें शामिल होने वाले सभी बच्चों को तोहफे के रूप में नाइकी के एयर स्नीकर दिए गए थे।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;मैं खुद ऐसी बर्थ डे पार्टियों में शामिल हुआ हूं, जिनमें चार साल के बच्चों के लिए आदमकद सिंड्रेला के आवागमन के साधनों का बंदोबस्त किया गया था और फॉक्स फामरूला कार का रेसिंग ट्रैक बिछाया गया था। टीवी पर ‘द बिग फैट इंडियन वेडिंग’ नामक एक शो आता है, जिसमें अमीर घराने टीवी वालों को अपनी शादी की कवरेज करने की अनुमति देते हैं। मैं इस शो का केवल एक ही एपिसोड बर्दाश्त कर सका था।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;शो में शादी के कार्यक्रम हफ्ते भर तक दिल्ली, राजस्थान और बाली में चलते रहे थे। इस दौरान पांच सौ मेहमान इधर से उधर होते रहे। लेकिन अंत में वही हुआ, जो सभी शादियों में होता है यानी एक लड़का और एक लड़की परिणय सूत्र में बंध गए। एक अन्य भारतीय शादी के बारे में इंटरनेशनल हेरॉल्ड ट्रिब्यून ने हाल ही में मुखपृष्ठ पर एक स्टोरी छापी। इस बार खबर नोएडा के एक गांव से थी। एक किसान ने अपनी जमीन बेच डाली और बेटे की शादी के लिए एक हेलीकॉप्टर किराए पर ले लिया।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;ऐसे बरतावों की पैरवी में एक तर्क दिया जा सकता है। ये कहा जा सकता है कि यदि किसी ने पैसा बनाया है तो उसे यह अधिकार है कि वह उसका जैसा चाहे उपयोग करे। दरअसल हमें तो खुश होना चाहिए कि आखिरकार भारतीय पैसों के मामले में अपना संकोच तोड़ रहे हैं। फिर यदि कोई सुश्री मायावती को पैसों का अजगर या पैसों का हाथी ही भेंट करना चाहे तो भला इसमें दिक्कत क्या है?&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;तब भी किसी-न-किसी स्तर पर यह ठीक नहीं लगता। जब मैं अपने बच्चों को टीवी पर या किसी पार्टी में पैसों का अश्लील प्रदर्शन करते देखता हूं तो कहीं-न-कहीं मुझे बुरा लगता है, क्योंकि इससे मेरे बच्चे को यह संदेश जाता है कि सफल लोग यही सब करते हैं। जीवन का अर्थ यही है। मुझसे कड़ी मेहनत करने को इसीलिए कहा जाता है ताकि मैं पैसा बना सकूं, नोटों को अपने चेहरे से लगा सकूं और दुनिया को यह बताने के लिए पैसा फूंक सकूं कि मेरा भी कोई वजूद है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;धन के प्रदर्शन से विनम्रता, संवेदनशीलता और आत्मनियंत्रण जैसे मूल्यों की क्षति होती है। विजेतागण युवा पीढ़ी को प्रेरित करते हैं और यदि समाज के विजेतागण इसी हवाई अंदाज में जिएंगे तो बच्चे उसका भी अनुकरण करना चाहेंगे। पैसे के शोरगुल में समाज के अन्य लोगों जैसे शिक्षकों, ईमानदार पुलिस अधिकारियों और चिकित्सकों द्वारा किया गया योगदान बौना हो जाता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;संभव है कि ये लोग इतने अमीर न हों, लेकिन इसके बावजूद वे बच्चों के लिए बेहतर रोल मॉडल हैं। इसी वजह से मैं देश के अमीरों से यह अनुरोध करना चाहूंगा कि वे अपने धन का प्रदर्शन न करें। शांत रहें। हमें मालूम है, आपके पास पैसा है। यदि आप वाकई हमें यह जताना चाहते हैं कि आपके पास कितना पैसा है तो इसके आंकड़े अपनी वेबसाइट पर डाल दें, लेकिन इस तरह तमाशा न बनाएं। आपने इतना पैसा बनाया, इससे हम प्रभावित हुए हैं। बहुत खूब। दस में दस अंक। शाबाश! लेकिन हमें साधारण ही बने रहने दीजिए।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;हालांकि सभी अमीर लोग ऐसे नहीं होते। दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों में से एक वॉरेन बफे, (जिनकी कुल संपत्ति २ लाख करोड़ रुपयों से भी अधिक है) अब भी ओमाहा के एक साधारण तिमंजिले कॉटेज में रहते हैं। अमेरिका में उनकी काफी इज्जत की जाती है। उन्हें अपने पैसों का प्रदर्शन करने की जरूरत नहीं। सिलिकॉन वैली में अपने दम पर अपना जीवन बनाने वाले सैकड़ों करोड़पति हैं, जो टी-शर्ट और जींस पहनकर काम करने जाते हैं और चमक-दमक वाली अमीरी को मुंह चिढ़ाते हैं। भद्दापन संपन्नता का जरूरी हिस्सा नहीं है। हालांकि शालीनता अमीर और रसूखदार भारतीयों के लिए अब भी एक नई चीज ही है, लेकिन फिर भी उसे अपनाया जा सकता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;इसका यह मतलब नहीं कि अमीर विलासिता के साथ नहीं जी सकते। हालांकि निजी और सार्वजनिक विलासिता में एक अंतर होता है। यदि उन्हें ऐसा करके ही संतोष मिलता है तो वे अपने घर पर सोने की तश्तरियों में खाना खा सकते हैं और एवियन वॉटर से नहा सकते हैं। लेकिन यदि उनके धन का सार्वजनिक प्रदर्शन हो रहा हो तो ऐसा करने से पहले उन्हें दो बार सोचना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;यदि सुश्री मायावती को नोटों की माला पहनकर आत्मिक खुशी मिलती है तो इस पर बहस करना मुश्किल है। वे हजार रुपए के नोटों से अपने कमरे का वॉलपेपर बना सकती हैं, लेकिन लाखों रुपयों की नोटों की माला पहनकर उन्हें भारत के बच्चों के सामने उसका प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। उनके चाटुकार और वे लोग जो यह मानते हैं कि पैसा ही महानता का परिचायक है, इसके लिए जरूर उनकी सराहना कर सकते हैं। हालांकि यदि ज्यादा नहीं तो कुछ ऐसे भी होंगे, जो ऐसा न करें।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चे ऐसे बरतावों का अनुकरण करें। हम चाहते हैं कि वे सच्चे नेताओं का अनुकरण करें। वे नेता, जो श्रेष्ठ मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, समाज का भला करते हैं और लोगों की मदद करते हैं। वे जो संयम, संतुलन और विनम्रता का प्रदर्शन करते हैं। ये वे लोग हैं, जिन्हें हम वास्तव में अमीर कह सकते हैं। वह वीभत्स माला पहनने से सुश्री मायावती अमीर नहीं हो गईं। ऐसा करके वे नोटों के बंडलों के बीच फंसी एक असहाय महिला ही साबित हुईं, जो किसी अजगर की तरह उनके राजनीतिक कॅरियर का दम घोंट सकता है। उम्मीद है कि वे इसकी जकड़न से मुक्त हो सकेंगी।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; "&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;चेतन भगत&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;लेखक अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार हैं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="clear" style="padding-top: 0px; padding-right: 0px; padding-bottom: 0px; padding-left: 0px; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; clear: both; font-size: 0px; visibility: hidden; "&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7066465544984604668-7521859706102209617?l=fight4nation.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://fight4nation.blogspot.com/feeds/7521859706102209617/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_24.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/7521859706102209617'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/7521859706102209617'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_24.html' title='गले में नोटों का अजगर'/><author><name>young voice</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02922572829347384095</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6sI1A5MZAI/AAAAAAAAACw/mMJ6rCQ74Tk/s72-c/chetan-bhagat1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7066465544984604668.post-2864153023419636634</id><published>2010-03-23T04:41:00.000-07:00</published><updated>2010-03-23T04:44:13.605-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vk vaidik'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='meri aawaz'/><title type='text'>यह लोहिया की सदी हो</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6ipaR_wnFI/AAAAAAAAACo/TkR4qSv3TJ8/s1600-h/ved1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 288px; height: 224px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6ipaR_wnFI/AAAAAAAAACo/TkR4qSv3TJ8/s400/ved1.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5451793617904507986" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div id="articles_content"&gt; &lt;div class="uni_txt"&gt; &lt;p&gt;जन्म शताब्दियां तो कई नेताओं की मन रही हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि स्वतंत्र भारत  में क्या राममनोहर लोहिया जैसा कोई और नेता हुआ है? इसमें शक नहीं कि पिछले 63  सालों में कई बड़े नेता हुए, कुछ बड़े प्रधानमंत्री भी हुए, लेकिन लोहिया ने जैसे  देश हिलाया, किसी अन्य नेता ने नहीं हिलाया। &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;उन्हें कुल 57 साल का जीवन मिला, लेकिन इतने छोटे से जीवन में उन्होंने जितने  चमत्कारी काम किए, किसने किए? जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से लोहिया का अपने  युवाकाल में कैसा आत्मीय संबंध था, यह सबको पता है। लेकिन यदि लोहिया नहीं होते तो  क्या भारत का लोकतंत्र शुद्ध परिवारतंत्र में नहीं बदल जाता? &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;वे लोहिया ही थे, जो नेहरू की दो-टूक आलोचना करते थे। चीनी हमले के बाद लोहिया  ने ही नेहरू सरकार को ‘राष्ट्रीय शर्म की सरकार’ कहा था। उन्होंने ही ‘तीन आने’ की  बहस छेड़ी थी। यानी इस गरीब देश का प्रधानमंत्री खुद पर 25 हजार रुपए रोज खर्च करता  है, जबकि आम आदमी ‘तीन आने रोज’ पर गुजारा करता है। लोहिया ने ही उस समय की अति  प्रशंसित गुट-निरपेक्षता की विदेश नीति पर प्रश्नचिह्न् लगाए थे और नेहरूजी की  ‘विश्वयारी’ पर तीखे व्यंग्य बाण चलाए थे। &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;उन्होंने सरकारी तंत्र के मुगलिया ठाठ-बाट की निंदा इतने कड़े शब्दों में की थी  कि सारा तंत्र भर्राने लगा था। उन्होंने देश के हजारों नौजवानों में सरफरोशी का जोश  भर दिया था। सारे देश में तरह-तरह के मुद्दों पर सिविल नाफरमानी के आंदोलन चला करते  थे। राजनारायण, मधु लिमये, रवि राय, किशन पटनायक, एसएम जोशी, लाडली मोहन निगम,  जॉर्ज फर्नाडीज जैसे कई छोटे-मोटे मसीहा लोहिया ने सारे देश में खड़े कर दिए थे।  कहीं जेल भरो, कहीं रेल रोको, कहीं अंग्रेजी नामपट पोतो, कहीं जात तोड़ो, कहीं कच्छ  बचाओ, कहीं भारत-पाक एका करो जैसे आंदोलन निरंतर चला करते थे।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;लोहिया के आंदोलनों में अहिंसा का ऊंचा स्थान था, लेकिन वे वस्तु की हिंसा यानी  तोड़-फोड़ को हिंसा नहीं मानते थे। उन्होंने प्राण की हिंसा करने वाली यानी  प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने वाली अपनी ही केरल की सरकार को गिरवा दिया था।  लोहिया ने भारत के नेताओं और राजनीतिक दलों को यह सिखाया कि सशक्त विपक्ष की भूमिका  कैसे निभाई जाती है? लोकसभा में लोहियाजी की संसोपा के दर्जनभर सदस्य भी नहीं होते  थे, लेकिन वहां बादशाहत संसोपा की ही चलती थी। जब लोहिया और मधु लिमये सदन में  प्रवेश करते थे तो वह समां देखने लायक होता था। एक करंट-सा दौड़ जाता था।  मंत्रिमंडल के सदस्य लगभग ‘अटेंशन’ की मुद्रा में आ जाते थे और स्वयं प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी के चेहरे पर बेचैनी छा जाती थी। &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;दर्शक दीर्घा में बैठे लोग कहते सुने जाते थे, वो लो, डॉक्टर साहब आ गए। डॉक्टर  लोहिया ने अपनी उपस्थिति से लोकसभा को राष्ट्र का लोकमंच बना दिया। जिस दबे-पिसे  इंसान की आवाज सुनने वाला कोई नहीं होता, उसकी आवाज को हजार गुना ताकतवर बनाकर सारे  देश में गुंजाने का काम डॉ लोहिया करते। कोई मामूली मजदूर हो, कोई सफाई कामगार हो,  कोई भिखारी या भिखारिन हो- डॉ लोहिया उसे न्याय दिलाने के लिए अकेले ही संसद को  हिला देते थे। लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकुम सिंह कई बार बिल्कुल पस्त हो जाते थे। मई  1966 में जब डॉ लोहिया ने मेरा अंतरराष्ट्रीय राजनीति का पीएचडी का शोध-प्रबंध  हिंदी में लिखने का मामला उठाया तो इतना जबर्दस्त हंगामा हुआ कि सदन में मार्शल को  बुलाना पड़ा। डॉ लोहिया और उनके शिष्यों के तर्क इतने प्रबल थे कि सभी दलों के  प्रमुख नेताओं ने मेरा समर्थन किया। इंदिराजी के हस्तक्षेप पर स्कूल ऑफ इंटरनेशनल  स्टडीज ने अपना संविधान बदला और मुझे यानी प्रत्येक भारतीय को पहली बार स्वभाषा के  माध्यम से ‘डॉक्टरेट’ करने का अधिकार मिला।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;डॉ लोहिया के व्यक्तित्व में चुंबकीय आकर्षण था। वे देखने में सुंदर नहीं थे।  उनका कद छोटा और रंग सांवला था। उनके खिचड़ी बाल प्राय: अस्त-व्यस्त रहते थे। उनके  खादी के कपड़े साफ-सुथरे होते थे, लेकिन उनमें नेहरू या जगजीवनराम या सत्यनारायण  सिंह जैसी चमक-दमक नहीं रहती थी। वे सादगी और सच्चई की प्रतिमूर्ति थे। वे जिस विषय  पर भी बोलते थे, उसमें मौलिकता और निर्भीकता होती थी। वे सीता-सावित्री पर बोलें,  शिव-पार्वती पर बोलें, हिंदू-मुसलमान या नर-नारी समता पर बोलें, अंग्रेजी हटाओ या  जात तोड़ो पर बोलें- उनके तर्क प्राणलेवा होते थे। जो एक बार डॉ लोहिया को सुन ले  या उनको पढ़ ले, वह उनका मुरीद हो जाता था। &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;डॉ लोहिया ने अपने भाषण और लेखन में जितने विविध विषयों पर बहस चलाई है, देश के  किसी अन्य राजनेता ने नहीं चलाई। सिर्फ डॉ भीमराव आंबेडकर और विनायक दामोदर सावरकर  ही ऐसे दो अन्य विचारशील नेता दिखाई पड़ते हैं, जो डॉ लोहिया की श्रेणी में रखे जा  सकते हैं। डॉ लोहिया ने जर्मनी से डॉक्टरेट की थी। इस खोजी वृत्ति के कारण वे हर  समस्या की जड़ में पहुंचने की कोशिश करते थे। सप्रू हाउस में उस समय रिसर्च कर रहे  डॉ परिमल कुमार दास, प्रो कृष्णनाथ और मेरे जैसे कई नौजवान उनके अवैतनिक सिपाही थे।  इसी का परिणाम था कि 1967 में डॉ लोहिया देश में गैर कांग्रेसवाद की लहर उठाने में  सफल हुए। जनसंघियों और कम्युनिस्टों ने भी उनका साथ दिया और देश के अनेक प्रांतों  में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं। यदि डॉक्टर लोहिया 10-15 साल और जीवित  रहते तो उन्हें प्रधानमंत्री बनने से कौन रोक सकता था? अब से 30-35 साल पहले ही  भारत का चमत्कारी रूपांतरण शुरू हो जाता और अब तक वह दुनिया की ऐसी अनूठी महाशक्ति  बन जाता, जिसका जोड़ इतिहास में कहीं नहीं मिलता। &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;जो भी हो, डॉ लोहिया असमय चले गए हों, लेकिन उनके विचार इस इक्कीसवीं सदी के  प्रकाश-स्तंभ की तरह हैं। सप्त-क्रांति का उनका सपना अभी भी अधूरा है। जाति-भेद,  रंग-भेद, लिंग-भेद, वर्ग-भेद, भाषा-भेद और शस्त्र-भेद रहित समाज का निर्माण करने  वाले नेता अब ढूंढ़ने से भी नहीं मिलते। इस समय सभी दल चुनाव की मशीन बन गए हैं। वे  सत्ता और पत्ता के दीवाने हैं। यदि डॉ लोहिया का साहित्य व्यापक पैमाने पर पढ़ा जाए  तो आशा बंधेगी कि शायद आदर्शवादी नौजवानों की कोई ऐसी लहर उठ जाए, जो इस भारत को नए  भारत में और इस दुनिया को नई दुनिया में बदल दे। लोहिया को गए अभी सिर्फ 43 साल ही  हुए हैं। उनका शरीर गया है, विचार नहीं, विचार अमर हैं। विचारों को परवान चढ़ने में  कई बार सदियों का समय लगता है। अभी तो सिर्फ पहली सदी बीती है। हम अपना धैर्य क्यों  खोएं? क्या मालूम आने वाली सदी लोहिया की सदी हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;लेखक प्रसिद्ध राजनीतिक  चिंतक हैं।&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;!-- / Full Article Matter --&gt; &lt;div class="clear"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;!-- / Article Content --&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7066465544984604668-2864153023419636634?l=fight4nation.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://fight4nation.blogspot.com/feeds/2864153023419636634/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_23.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/2864153023419636634'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/2864153023419636634'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_23.html' title='यह लोहिया की सदी हो'/><author><name>young voice</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02922572829347384095</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6ipaR_wnFI/AAAAAAAAACo/TkR4qSv3TJ8/s72-c/ved1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7066465544984604668.post-1484201034995629145</id><published>2010-03-20T01:37:00.000-07:00</published><updated>2010-03-20T02:01:45.839-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कोपल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='meri aawaz'/><title type='text'>भारत की हर उठती समस्या का कारण है हमारा पल पल बदलता नजरिया</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6SOe0A3q8I/AAAAAAAAACY/v2IU4PeEydA/s1600-h/frfr.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5450638109034654658" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 160px; CURSOR: hand; HEIGHT: 212px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6SOe0A3q8I/AAAAAAAAACY/v2IU4PeEydA/s400/frfr.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;{कोपल श्रीवास्तव }&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा" ये बोल जब हमारे कानों में पड़ते हैं तो हमारा रोम रोम भारतीय होने के गौरव से महक उठता है। पर अफ़सोस की बात ये है की अपने भारतीय होने पर गर्व करने के लिए हमें प्रेरित होने के लिए फिल्मों या प्रेरणा से भरी हुई देशभक्ति कविताओं की ज़रूरत पड़ती है. आज देश की हालत के लिए हम चाहे किसी को भी जिम्मेदार ठहरा दें, पर हमारा अंतर्मन इस बात को स्वीकारता है की हम अपने देश की आत्मा से कहीं दूर निकल गए है. इस तरह अपनी मात्रभूमि के एहसास से दूर होने की वजह कुछ भी हो, परन्तु ये एक कड़वा सत्य है कि, हमारे पास अपने देश कि हालत के लिए समाज, नेताओं व आतंकवाद को दोष देने के लिए वक़्त है, परन्तु आत्मीयता से अपने राष्ट्र कि समस्याओं को सुलझाने के बारे में सोचने का कहीं किसी के पास वक़्त नहीं है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा देश हर तरफ से समस्याओं से घिरा हुआ है, ये समस्याएं आर्थिक भी है और सामाजिक भी. राजनितिक मुद्दे तो हर समस्या का आधार ही बन कर रह गए हैं. परन्तु मेरी नज़र में भारत की सबसे बड़ी समस्या भारतीयों का अपने देश के सन्दर्भ लापरवाही से भरा हुआ नजरिया है. हर कोई भ्रष्टाचार की धूनी रमा रहा है, तो कोई विदेशों की महिमा के गीत गा रहा है, युवाओं को नशे में धुत्त रहने और रटे-रटाये रस्ते पर चलने के आलावा कोई काम ही नहीं है.&lt;br /&gt;आज हर भारतवासी, भारतीय होने से पहले मराठी, पंजाबी और हरयाणवी हो गया है. सरहदों पर लकीरें खींचने में फिरंगी कामयाब रहे और अब घर के आँगन में लकीर खींचने के लिए मतलबी राजनीतिज्ञ तत्पर हैं. हम क्या कर रहे हैं....युवा वर्ग होने के नाते अपने राष्ट्र के लिए लाखों जिम्मेदारियां बनती हैं, पर हमारे पास अपनी बेनाम ज़िन्दगी जीने के आलावा कोई काम ही नहीं है.&lt;br /&gt;आज अगर सवाल ये उठाया जाता है की भारत के सामने सब से बड़ी समस्या क्या है तो सब अपना मत रखना शुरू करेंगे और ये तय है की निम्नलिखित समस्याओं के अलावा कोई समस्या नहीं लिख पाएंगे...&lt;br /&gt;भ्रष्टाचार&lt;br /&gt;सामाजिक समस्याएं&lt;br /&gt;आर्थिक समस्याएं&lt;br /&gt;राजनितिक समस्याएं&lt;br /&gt;आतंकवाद&lt;br /&gt;धार्मिक समस्याएं.&lt;br /&gt;परन्तु मैं यहाँ पे सिर्फ ये मुद्दा उठाना चाहती हूँ कि, ये समस्याएं सिर्फ उस अमर बेल कि शाखाएं मात्र हैं जो हमारे देश को दिन रात ख़त्म करने में अग्रसर है. हमें इसकी जड़ तक जाना चाहिए और इस अमरबेल कि जड़ कुछ और है. यानि सब समस्याओं का आधार कुछ और है . और वो आधार है हमारा सोचने का नजरिया और हमारे दिलों से पल पल मिटती भारतीयता.&lt;br /&gt;अब फैसला हमारा है. हमें तय करना है कि हमें हमारी जिम्मेदारियां कैसे निभानी है या हमेशा कि तरह आँखें मूँद कर चलते रहना है.&lt;br /&gt;जय हिंद.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7066465544984604668-1484201034995629145?l=fight4nation.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://fight4nation.blogspot.com/feeds/1484201034995629145/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_4347.html#comment-form' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/1484201034995629145'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/1484201034995629145'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_4347.html' title='भारत की हर उठती समस्या का कारण है हमारा पल पल बदलता नजरिया'/><author><name>young voice</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02922572829347384095</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6SOe0A3q8I/AAAAAAAAACY/v2IU4PeEydA/s72-c/frfr.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7066465544984604668.post-4678350816808597351</id><published>2010-03-20T01:06:00.000-07:00</published><updated>2010-03-20T01:13:00.137-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुलदीप शर्मा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='meri aawaz'/><title type='text'>रिलायंस फ्रेश की बदौलत बढ़ी है देश में महंगाई</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6SCfGFQYGI/AAAAAAAAACQ/QrCwH3zhyIw/s1600-h/ewwe.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5450624919745355874" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 275px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6SCfGFQYGI/AAAAAAAAACQ/QrCwH3zhyIw/s400/ewwe.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;{कुलदीप शर्मा}&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम आदमी का जीना मुहाल कर देने वाली महंगाई पर तरह-तरह के विश्लेषण किए गए हैं लेकिन किसी ने भी यह जहमत उठाने की कोशिश नहीं की है कि आखिर हमारे देश में प्रचुर उत्पादन के बावजूद एकाएक शक्कर के साथ अन्य सभी खाद्य पदार्थों की कीमतों में क्यों बढ़ोत्री हुई है। कुछ दिन पहले जब रिलायंस फ्रेश के सर्वेसर्वा मुकेश अंबानी ने यह घोषणा की कि उनकी कंपनी जल्द ही दूध का कारोबार भी शुरू करेगी. तब माथा ठनका और महंगाई बढ़ने का कारण समझ में आने लगा। मुकेश की इस घोषणा के एक-दो दिन बाद ही कृषि मंत्री की तरफ से यह बयान आ गया कि उत्तर भारतीय इलाकों में दूध के उत्पादन में कमी हुई है लिहाजा कभी भी दूध के दाम बढ़ सकते हैं। कृषि मंत्री का यह बयान देना था कि अचानक शक्कर लॉबी की तरह मजबूत होती जा रही दूध लॉबी ने भी दामों को बढ़ा दिया और आम आदमी मन मसोसकर रह गया। वह बेचारा कर ही क्या सकता है सिर्फ सरकार के साथ अपने भाग्य को कोसने के।अभी से करीब 3 साल पहले तक मौसम की मार से या किसी प्राकृतिक आपदा की बदौलत देश में किसी एकाध कृषि उपभोक्ता वस्तु की कीमतों में बढ़ोतरी हो जाया करती थी, मसलन कभी प्याज तो कभी आलू या फिर कोई भी दाल-दलहन। ऐसा कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलता कि मौसम अथवा प्राकृतिक आपदा के कारण सभी खाद्य पदार्थों की उपलब्धता प्रभावित हुई हो, लेकिन बीते 3 वर्षों में देश में पैदा होने वाली लगभग सभी कृषि जीन्सों की भरपूर पैदावार होने के बावजूद फसल आने के समय भी दामों में किसी प्रकार की कमी दिखाई नहीं दे रही है। यदि कभी-कभार ऐसी स्थिति बनती भी है तो कृषि मंत्री यह बयान देकर पूरी कर देते हैं कि मौसम की मार से कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ है और दामों में बढ़ोत्री होना संभव है। उनका यह बयान देना होता है कि बाजार से एकाएक उस कृषि जीन्स की मांग बढ़ जाती है और कल तक जो सर्व-सुलभ वस्तु थी, वह गायब हो जाती है। इस बात के लिए कृषि मंत्री को चुनौती दी जा सकती है कि वे बताएं कि कौन से वर्ष में कृषि आधारित सभी फसलों की कमी की वजह से हर उत्पाद के दामों में दो गुनी तक वृद्धि हुई थी। यदि वे इसका संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाते हैं तो यही माना जाना चाहिए कि उन्होंने इरादतन किसी उद्योग घराने को लाभ पहुंचाने की खातिर और देश की जनता को गुमराह करने के उद्देश्य से ऐसे बयान देकर आम आदमी को महंगाई की आग में झोंका है। लोकतंत्र के चौथे महत्वपूर्ण स्तंभ कहे जाने वाले आत्ममुग्ध मीडिया के किसी भी संस्करण (प्रिंट अथवा इलेक्ट्रानिक) ने इस बात के लिए कृषि मंत्री से सवाल तक करना जरूरी समझा है कि आखिर कौन से कारण रहे हैं जिनकी बदौलत लगातार तीन साल से सरकार और खासकर कृषि मंत्री महंगाई थामने में विफल रहे हैं। कृषि मंत्री का यह कह देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता और न ही वे अपनी जिम्मेदारी से यह कहकर बच सकते हैं कि सभी फैसले कैबिनेट की सहमति से होते हैं इसलिए महंगाई के लिए अकेले उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। वैसे उनके बयान का मतलब यह भी निकलता है कि सरकार के सभी नुमाइंदों की जनता को गुमराह करने में शामिल हैं।गौरतलब है कि 30 सितंबर 2006 को मुकेश अंबानी ने यह घोषणा की कि वे अपने परंपरागत उद्योग-धंधों के साथ अब देश में मौजूद विषाल खुदरा बाजार में तेल-गुड़ के साथ फल-सब्जी भी बेचना शुरू करेंगे। खुदरा बाजार पर अपनी पकड़ बनाने के लिए उन्होंने 4 साल के अंदर 25 हजार करोड़ रुपए निवेश करने की योजना बनाई थी। यदि इस निवेश को आसान शब्दों में समझाना हो तो इसका मतलब यह निकलता है कि हर भारतीय पर कम से कम 22 सौ रुपए का निवेश किया। इस योजना के मुताबिक देश के 14 प्रदेशों के खास 80 शहरों में 50 लाख उपभोक्ताओं को उचित गुणवत्ता का खाद्य सामान उपलब्ध करवाने के लिए 900 से अधिक स्टोर खोले जाने का लक्ष्य था। उनके द्वारा निर्धारित समय की सीमा पूर्ण होने में अभी तकरीबन 6 माह का समय और बचा है. लेकिन इन साढ़े तीन सालों में महंगाई ने अपना असली रूप दिखा दिया है और देश की तकरीबन 20 फीसदी आबादी को दाने-दाने के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया है। केवल 50 लाख लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए रिलायंस फ्रेश के इस व्यापार में कूद जाने से अब हालात कितने भयावह हो गए हैं। यहां यह बताना गैरजरूरी नहीं है कि वर्ष 2006-07 में मुंबई की प्रति व्यक्ति आय 65 हजार 361 रुपए थी, जो देश की औसत प्रति व्यक्ति आय 29 हजार 382 रुपए के मुकाबले दोगुनी होती है। देश में सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय होने के बावजूद अकेले मुंबई की दस फीसदी आबादी (करीब 10 लाख लोग) की आय 20 रुपए प्रतिदिन भी नहीं, बल्कि केवल 591.75 पैसे ही है। ऐसे परिवारों के पास टीवी, फ्रिज, पंखा तो दूर की बात है घरों शौचालय, पानी की आपूर्ति का स्रोत अथवा अपना वाहन तक की कोई सुविधा नहीं है। ऐसे में देश के केवल 50 लाख लोगों को सुविधाएं देने नाम पर 25 हजार करोड़ रुपए के निवेश के जरिए आम आदमी को महंगाई की भट्टी में झोंक देने को क्या कहा जाएगा।मेरे दूध लॉबी की अवधारणा से अनेक को आपत्ति हो सकती है, लेकिन जिस तरह से दूध का धंधा शहरों और कस्बों में फैला है और जिस तरह से शासन-प्रशासन उनके सामने घुटने टेकने को मजबूर रहता है, उससे इस लॉबी की विशालता पता चलता है। दोपहिया वाहन पर जिस तरह से दूध की कम से कम दो बड़ी-बड़ी टंकियां (अधिकतम की 4 से 6 तक) लादकर जिस तरह भीड़ भरे ट्राफिक में से गुजर कर इस लॉबी के कर्ता-धर्ता अपने काम को बेखौफ हो अंजाम देते हैं, उस देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि शहर-कस्बे में यातायात पुलिस प्रशासन नाम की कोई व्यवस्था भी है। ऐसा भी नहीं है कि ये नजारे केवल छोटे-मोटे कस्बे अथवा शहर के हों, कमोबेश पूरे हिन्दुस्तान में इन नजारों को देखा और महसूस किया जा सकता है। क्या यातायात नियमों में दोपहिया वाहन पर दूध की टंकियां लादने को छूट दी गई है? मीडिया में बेकाबू होती महंगाई पर खूब लिखा जा चुका है, लेकिन खास बात यह है कि किसी ने भी इसका विश्लेषण करने की जहमत नहीं उठाई है कि आखिर ऐसा क्या हो गया जिसने अर्थशास्त्र के सिद्धांतों तक को दरकिनार कर दिया है। अर्थशास्त्र के सामान्य सिद्धांत के अनुसार बाजार में मांग और धन का प्रवाह बढ़ने पर मुद्रास्फीति की दर के साथ महंगाई में भी बढ़ोत्री होती है लेकिन कुछ माह पहले (गत वर्ष जून में) तक तो मुद्रास्फीति की दर ऋणात्मक थी, बावजूद इसके बाजार में न सिर्फ कृषि उत्पाद मसलन दाल, चावल, शक्कर और अनाज की कीमत में कोई कमी दिखी। दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले मुद्रास्फीति की ऋणात्मक दर वर्ष 1978 के आसपास हुई थी और उस समय शक्कर सहित अन्य सभी कृषि आधारित वस्तुओं की कीमतें बेहद कम हो गई थी। आपातकाल के दौरान भी शक्कर की कीमत काफी बढ़ी हुई थी और राशन दुकानों पर कम कीमत पर शक्कर उपलब्ध कराई जाती थी। उस समय (वर्ष 1978) ऋणात्मक मुद्रास्फीति ने शक्कर की कीमतों को राशन दुकान पर उपलब्ध कीमत से भी कम पर ला दिया था लेकिन इस बार की ऋणात्मक मुद्रास्फीति ने ऐसा कोई कारनामा अंजाम नहीं दिया उल्टे सभी वस्तुओं के दाम स्थिर ही बने रहे। मतलब यह कि मतलब यह कि जिस तेजी से कृषि उत्पादों की कीमतें बढ़ रही थी, केवल उनका बढ़ना भर रुका था। इसका कारण साफ था कि यह सब जमाखोरी के चलते संभव हो पाया था और आज भी सरकार इस पर अंकुश लगा पाने में पूरी तरह नाकामयाब ही दिखती है वह केवल लोगों को यह बयान देकर अपने कर्तव्य को पूरा करने में लगी है कि सरकार द्वारा महंगाई को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं जल्द ही लोगों को महंगाई से निजात मिलेगी लेकिन ठोस उपाय करने के नाम पर मौद्रिक नीति में थोड़ा उलटफेर कर दिया जाता है।महंगाई के मुद्दे पर सभी दलों की खामोशी ने यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि शासन करने की मौजूदा नीति केवल उद्योगपतियों के साथ नेताओं और अफसरों के लिए ही फायदेमंद साबित हो रही है, आम आदमी तो बस जल्द ही अपने गरीबी की रेखा में आने का इंतजार कर रहा है और तैसे-तैसे अपने दिन गुजारने को मजबूर है. मौजूदा महंगाई में सामान्य आदमी अपना गुजारा कैसे चला पा रहा है, यह उससे बेहतर और कोई नहीं जान सकता है और शासन-प्रशासन ने जनता को तो भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7066465544984604668-4678350816808597351?l=fight4nation.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://fight4nation.blogspot.com/feeds/4678350816808597351/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_20.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/4678350816808597351'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/4678350816808597351'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_20.html' title='रिलायंस फ्रेश की बदौलत बढ़ी है देश में महंगाई'/><author><name>young voice</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02922572829347384095</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6SCfGFQYGI/AAAAAAAAACQ/QrCwH3zhyIw/s72-c/ewwe.jpg' height='72' 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दौड़ती-भागती इस जिंदगी में अखबार की सुर्खियां पढ़ने का सुख अब चाय की चुस्कियों के साथ नहीं मिलता। ... लेकिन इन सबके बीच जो अब तक नहीं बदली वो है सिनेमा की ताकत। आज भी न्यूज चैनल्स चाहे कितनी भी विविधता और वर्चुअल ग्राफिक्स के सहारे खबरों को आम आदमी से जोड़ने की कोशिश कर लें लेकिन वो एक दर्शक के मन-मस्तिष्क पर वो छाप नहीं छोड़ पाते जो सिनेमाहॉल से 3 घंटे बाद बाहर निकलने पर एक दर्शक खुद में महसूस करता है। आज भी सिनेमा वो हथियार है जिसमें समाज को बदलने की अदभुत क्षमता है। कई बार ये हथियार 'थ्री इडियट्स' के रूप में हमें अपने दिल पर हाथ रख कर 'AAL IZ WELL' कहकर अपनी जिंदगी की कठिनाइयों का मुकाबला करना सिखाता है, तो कई बार ये हमारे सामने लव सेक्स और धोखा परोसकर हमें ये सोचने पर मजबूर करता है कि नैतिक, अनैतिक या फिर दूसरे शब्दों में कहें तो हमारी सही-गलत की ब्लैक एंड व्हाइट विचारधारा पर...'ग्रे शेड्स' कितने हावी होते जा रहे हैं। यानी असल जिंदगी की कड़वी हकीकतों को दर्शकों को सामने गालियों की मिर्च और सेक्स का मसाला लगाकर पेश करना ही क्या अब सिनेमा की मजबूरी बन गई है?&lt;br /&gt;लव सेक्स और धोखा आज हिन्दी सिनेमा का एक बदलता हुआ क्रांतिकारी रूप है... इसलिए नहीं कि इस फिल्म ने सिनेमा में क्रिएटिविटी के एक नए आयाम को छुआ है बल्कि इसलिए क्योंकि इस फिल्म के प्रोमो में ही 40 बीप्स (अश्लील शब्द छिपाने के लिए लगाई जाने वाली आवाज) हैं और इसके एक गाने के बोल हैं... 'तू नंगी अच्छी लगती है'। ये वो शब्द हैं, जिन्हें फिल्म की जरूरत बताकर निर्देशक आपको सिनेमाघरों में खींचने की कोशिश कर रहे हैं। Hidden Camera के जरिए पूरी फिल्म में ये दिखाने की कोशिश की गई है कि कैसे आज के युवा किसी भी जगह सारी सीमाओं को तोड़कर अपनी भावनाओं पर काबू रखना भूल जाते हैं। डिपार्टमेंटल स्टोर से लेकर बेडरूम तक के सभी सीन खुफिया कैमरे से शूट किए गए हैं। इतना ही नहीं फिल्म में भरपूर गालियों का तड़का भी लगाया गया है।&lt;br /&gt;आज सिनेमा भले ही परी कथाओं की दुनिया से बाहर निकलर हकीकत की जमीन पर तेज दौड़ लगा रहा हो लेकिन महज वास्तविकता दिखाने की आड़ में अपनी फिल्म को बेचने के लिए महिलाओं का सेक्स ऑब्जेक्ट की तरह इस्तेमाल किसी भी तरह जायज नहीं ठहराया जा सकता। मुझे याद है 1994 में जब मैं पांचवीं क्लास में पढ़ता था, उस वक्त करिश्मा कपूर और गोविंदा की फिल्म खुद्दार का एक गाना रिलीज हुआ था। गाने में करिश्मा कह रही थीं... सेक्सी सेक्सी सेक्सी मुझे लोग बोलें। बस करिश्मा का इतना बोलना, सेंसर बोर्ड को आपत्तिजनक लगा और गाने के बोल में से सेक्सी शब्द हटाकर बेबी शब्द से बदल दिया गया। खैर इस बात को अब काफी वक्त बीत चुका है और इस दौरान हमारे समाज में काफी बदलाव भी आया है। शायद फिल्म को रिलीज करने के साथ ही सेंसर बोर्ड अपनी इमेज को पहले से ज्यादा बोल्ड बनाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन क्या वाकई हम ये बदलाव चाहते हैं जिसमें खुद को मॉडर्न दिखाने के चक्कर में हम गालियों के जरिए अपने प्यार का इजहार कर रहे हों। मार्केटिंग के इस दौर में&lt;br /&gt;जहां आमिर ने शहर-शहर वेष बदलकर लोगों के बीच अपनी फिल्म का प्रचार किया... तो शाहरुख ने शिवसेना के साथ हुए विवाद के सहारे अपनी फिल्म को प्रमोट करने के लिए ट्विटर पर अपने बयानों से पब्लिसिटी बटोरी। लेकिन इन सबके बावजूद आज भी लोगों को थिएटर तक खींचने का सबसे आसान तरीका है सेक्स। ये तो सभी जानते हैं कि सेक्स कल भी बिकता था और आज भी बिकता है। इसके बाद तो किसी और पब्लिसिटी स्टंट की जरूरत ही नहीं रह जाती। मगर सवाल अब भी वही है कि फिल्म दर फिल्म बढ़ता हुआ सेंसर बोर्ड का दायरा किस हद तक नंगेपन और गालियों के इस्तेमाल पर सिर्फ 'A' सर्टिफिकेट का टैग लगाकर संतुष्ट हो जाएगा। लगता है अब वो दिन दूर नहीं जब अपनी लाचारी की बैसाखी पर चलकर सेंसर बोर्ड को मजबूरन 'U', 'U/A' और 'A' सर्टिफिकेशन के बाद बहुत जल्द 'A+' कैटेगरी में फिल्मों को क्लीयरेंस देना पड़ेगा जिसमें वो सबकुछ होगा जो अब से पहले सिनेमाघरों में दिखाए जाने पर पाबंदी थी। लेकिन जरा सोचिए फिल्मों को समाज का आईना बताकर किस हद तक सच्चाई को हूबहू दर्शकों के सामने नाट्यरूपांतरण के जरिए पेश करना जायज है क्योंकि हम इस बात से कतई इंकार नहीं कर सकते कि हमारे समाज में ऐसे कई मुद्दे हैं जिनको पर्दे पर 'केवल वयस्कों के लिए' का बोर्ड लगाकर भी हम अपने सहकर्मियों और दोस्तों के साथ बैठकर नहीं देख सकते।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7066465544984604668-491126570688256722?l=fight4nation.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://fight4nation.blogspot.com/feeds/491126570688256722/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_522.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/491126570688256722'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/491126570688256722'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_522.html' title='सेक्स ने लव को दिया धोखा...'/><author><name>young voice</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02922572829347384095</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6JKzMkfuNI/AAAAAAAAABU/A-M2c16J_40/s72-c/uhiujjj.bmp' height='72' 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थी खुद गडकरी दिल्ली से दूर नागपुर में बैठे हुए थे और एक अखबार का लोकार्पण कर रहे थे. कार्यक्रम में वे पूरे समय मौजूद रहे पेड न्यूज पर अपना प्रवचन करते रहे.&lt;br /&gt;मराठी अखबार दैनिक लोकशाही के लोकार्पण समारोह में उनके अलावा दिल्ली से आये पत्रकार कुलदीप नैयर भी थे जिनके हाथों अखबार का लोकार्पण होना था. अपने अध्यक्षीय संबोधन में नितिन गडकरी ने कहा कि किसी अखबार को सफलता पूर्वक चलाना एक बड़ी चुनौती है। अखबार को एक व्यवसाय की नजर से देखते हुए मीडिया में उसकी गुणवत्ता बढ़ानी चाहिए। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि लोकशाही वार्ता विदर्भ विकास व समाज के शोषित, पीड़ित जनता के लिए कारगर साबित होगा।&lt;br /&gt;उन्होंने कहा कि अनेक पुराने समाचार पत्रों के रहने के बावजूद एक नया समाचार पत्र शुरु करना बड़ा साहस का काम है और यह साहस प्रबंध संपादक प्रवीण महान ने किया है। इस अखबार के सामने बहुत से आह्वान हैं। इन आह्वानों को लोकशाही वार्ता ने स्वीकारना होगा। 'पेड न्यूज' के संदर्भ में उन्होंने कहा कि इस पर बड़ा हो-हल्ला हो रहा है। पैसे देने वाले हम ही हैं, लेने वाले तैयार हैं और बोलने वाले भी हम ही हैं। ऐसे वक्त नैतिकता को संभालते हुए कौन बोले, कौन करे यह प्रश्र उपस्थित होता है। किंतु जो गलत है, वह गलत ही है। प्रचार-प्रसार माध्यमों की संख्या तो बढ़ रहीं है यह ठीक है, लेकिन गुणवत्ता खत्म होती जा रही है।&lt;br /&gt;एक ओर नागपुर में जहां गडकरी पत्रकारिता को चिड़िया गौरेया की कहानी सुनाकर आग बुझाने की प्रेरणा दे रहे थे वहीं दूसरी ओर दिल्ली में टीम घोषणा के वक्त गडकरी सहित किसी बड़े नेता के कार्यालय में मौजूद न होने के कारण भी भाजपा की भद्द पिटी. टीम घोषणा क्या हुई बस एक प्रेस रिलीज सबको बांट दी गयी. अगर मीडिया में से कोई बात करना चाहता था तो उसके लिए रविशंकर प्रसाद उपस्थित थे जो कि इस नये विस्तार में महासचिव के साथ साथ मुख्य प्रवक्ता बना दिये गये हैं.&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7066465544984604668-8379708098130541065?l=fight4nation.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://fight4nation.blogspot.com/feeds/8379708098130541065/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_8467.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/8379708098130541065'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/8379708098130541065'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_8467.html' title='राष्ट्रीय टीम की घोषणा के वक्त भी दिल्ली से दूर रहे गडकरी'/><author><name>young voice</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02922572829347384095</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6JJF9qEU6I/AAAAAAAAABM/1frMtYzOVmc/s72-c/ewewe.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7066465544984604668.post-2645907386495062723</id><published>2010-03-18T08:34:00.000-07:00</published><updated>2010-03-18T08:36:52.006-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='santosh kumar'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='meri aawaz'/><title type='text'>माला तो माया की, पर मालामाल कौन नहीं?</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6JITYaQ2zI/AAAAAAAAABE/CD9FUtIotrU/s1600-h/santosh_photo_357290303.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5449997996879043378" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 121px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6JITYaQ2zI/AAAAAAAAABE/CD9FUtIotrU/s320/santosh_photo_357290303.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;संतोष कुमार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाकई माला के अनेकों रूप। भगवान के गले में डाल दो, तो धर्म। शादी में दूल्हा-दुल्हन एक-दूसरे को पहनाएं, तो वरमाला। वर्कर अपने नेताओं को पहनाएं, तो आप ही तय करो। यह स्वागत या चमचागिरी? नेताओं के प्रति किसकी कितनी श्रद्धा, यह तो महानुभाव खुद ही जानते। फिर भी माला पहन हाथ ऐसे लहराते, मानो देश के पालनहार हो गए। कोई फूलों की माला पहन हाथ लहराता तो कोई सशरीर धर्मकांटे में बैठ सोने-चांदी के सिक्कों से तोला जाता है।&lt;br /&gt;यानी सबके अपने-अपने शौक। पर शौक में जब सत्ता का नशा जुड़ जाए। तो फिर शौक के क्या कहने। मायावती को वर्करों ने सोमवार को हजार-हजार के करारे नोटों की माला पहनाई। तो विरोधी नोट की चकाचौंध झेल नहीं पाए। सो बीजेपी ने 35 करोड़ की बताई, तो सपा ने 50 करोड़ की। यानी यूपी में जिसकी जितनी हैसियत, उतना हिसाब लगाया। पर माया का मिजाज बिगड़ा। तो फिर खम ठोक दिया, बुधवार को फिर नोटों की माला पहन ली। पर माला का किस्सा बुधवार को लखनऊ ही नहीं, पटना में भी हुआ। महिला बिल पर राज्यसभा में हुड़दंग करने वाले जद यू के निलंबित सांसद एजाज अली पटना पहुंचे। तो समर्थकों ने नोटों की माला पहनाई। पर नोट देख वर्करों की नीयत बदल गई। सो माला से नोट छीनकर भाग खड़े हुए। पर माया के सिपहसालार ऐसे नहीं।&lt;br /&gt;नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने तो एलान कर दिया- 'अगर बहनजी की इजाजत हो, तो एक-दो बार क्या, हर बार नोटों की माला पहनाएंगे।' सिद्दीकी ने अपनी मीडिया पर भी फब्ती कसी। आभार जता बोले- 'मीडिया ने 48 घंटे में ऐसी सुर्खियां बनाईं, हमारे बीएसपी वर्करों ने चंद घंटों में 18 लाख जुटा बहनजी को माला पहना दी।' यानी माया की चुनौती सिर्फ विरोधियों को नहीं, अपनी मीडिया को भी। अब भले माया का प्रदर्शन भौंडा हो। सत्ता के घमंड में चूर-चूर हो। पर क्या सवाल उठाने वाले ऐसा नहीं करते? माया और बाकी दलों में फर्क सिर्फ इतना। बाकी दल टेबल के नीचे से लेते, माया ने खुलेआम लिया। यानी सीधे सपाट शब्दों में कहें, तो इसे आप ईमानदारी से चोरी कह लें। नेता कितने पाक-साफ, यह जनता बखूबी जानती। पर माया की माला पर ही इतनी हायतौबा क्यों? माला कितने की, यह तो मालूम नहीं। पर इनकम टेक्स वाले अभी क्यों जागे? याद है, दिसंबर 2008 में बीजेपी हैडक्वार्टर से 2.6 करोड़ रुपए दिनदहाड़े चोरी हो गए। चोर बीजेपी के अपने ही थे। सो मीडिया में शोर मचने के बाद भी 'मौसेरे भाइयों' ने बात दबा ली। सो सवाल, तब इनकम टेक्स वाले कहां थे? बीजेपी ने तो एफआईआर तक दर्ज न होने दी। संसद में 22 जुलाई 2008 को नोटों की गड्डिïयां लहराईं। पर जांच कहां तक पहुंची? स्विस बैंक में जमा काला धन किसकी, जो वापस लाने की कोशिश नहीं हो रही। अब बीजेपी लोकतंत्र में लोकलाज की दुहाई दे रही। रविशंकर प्रसाद ने मायावती की तुलना सद्दाम हुसैन से की। पर लोकलाज का क्या मतलब? यही ना, चोरी करो, पर दरवाजा बंद करके। सद्दाम से तुलना माया की बुतपरस्ती को लेकर की। तो दूसरी तरफ कांग्रेस ने माया को दलित की बेटी नहीं, दौलत की बेटी कहा। अब जरा यह भी जान लो, दौलत की बेटी कहने वाला कौन? कोई और नहीं, राजा दिग्विजय सिंह ने यह उपाधि दी। वही दिग्गी राजा जब मध्य प्रदेश में सीएम थे तो सिक्कों और नोटों से कितनी बार तोले गए, शायद उन्हें भी याद न होगा।&lt;br /&gt;पर नोटों की माला की प्रवृत्ति आई कहां से? पूंजीवादी बाजार में घोड़ी पर बैठा दूल्हा नोटों की माला पहन रहा। तो भाई के हाथों पर बंधने वाली राखी भी अब नोटों की बनने लगी। क्या यह भौंडा प्रदर्शन नहीं? बीजेपी-कांग्रेस जैसे बड़े दलों को तो टाटा, बिरला, अंबानी जैसे लोगों से चुनावी चंदे मिल जाते। पर छोटे दल कहां झोली फैलाएं। बीएसपी में नोटों की माला नई परंपरा नहीं। जब बीएसपी उभार के दशक में थी। तब कांशीराम ने वर्करों से यही अपील की थी। फूलों के हार से तो हम हार जाएंगे। सो वर्कर थोड़ा-थोड़ा कर ही सही, नोटों की माला बनाएं। यानी पार्टी की जमीन तैयार करने के लिए आर्थिक मदद लेने का अपना तरीका। पर तब दस-पचास रुपए के नोटों की माला बनती थी। अब माया अपने बूते सरकार चला रहीं। तो सबसे बड़े नोट की माला पहन रहीं। अब अगर कोई इस फार्मूले को ही गलत कहे। तो फिर सवाल उठाने का हक न बीजेपी को, न कांग्रेस को। हाल ही में गडकरी बीजेपी के अध्यक्ष बने। तो यही अपील की, फूलमाला-मिठाई नहीं, दफ्तर में रखे बक्से में दान डालो। ताकि किसानों का भला कर सकें। मायावती यही काम अपने समाज के लिए कर रहीं। बीजेपी-संघ हर साल गुरु पूर्णिमा पर गुरु दक्षिणा का आयोजन करतीं। जहां बेनामी लिफाफे में किसने कितने दिए, पता ही नहीं चलता। कांग्रेस में तो बड़े-बड़े फंड मैनेजर बैठे हुए। सो राजनीति में लोग कांग्रेस की दुहाई देते। अगर लेन-देन के गुर सीखने हों, तो कांग्रेस से सीखो। पर यह कैसा जमाना। जब पहली बार तोलने की परंपरा शुरू हुई। तो श्रीकृष्ण ने गुरूर तोडऩे के लिए खुद को तुलवाया था। जाम्बवंती को गुमान था, श्रीकृष्ण से उन्हें ही ज्यादा प्रेम। सो नारद ने साबित करने को कहा। तो जाम्बवंती ने प्रेम दिखाने को समूचा राजपाट तराजू पर रख कृष्ण को तोलने की कोशिश की। पर कृष्ण का पलड़ा नहीं हिला। फिर रुक्मणि ने अपना प्रेम दिखाया, महज तुलसी का पत्ता पलड़े पर रखा, तो कृष्ण का पलड़ा ऊपर उठ गया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7066465544984604668-2645907386495062723?l=fight4nation.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://fight4nation.blogspot.com/feeds/2645907386495062723/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_7512.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/2645907386495062723'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/2645907386495062723'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_7512.html' title='माला तो माया की, पर मालामाल कौन नहीं?'/><author><name>young voice</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02922572829347384095</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6JITYaQ2zI/AAAAAAAAABE/CD9FUtIotrU/s72-c/santosh_photo_357290303.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7066465544984604668.post-4788245233408531596</id><published>2010-03-18T08:08:00.000-07:00</published><updated>2010-03-18T08:19:37.434-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='khushwant singh'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='meri aawaz'/><title type='text'>न मेरा नामोनिशां मिला</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6JCGtlqXbI/AAAAAAAAAAs/XfBIN1psfTg/s1600-h/Khushwant-Singh1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5449991182155931058" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 288px; CURSOR: hand; HEIGHT: 224px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6JCGtlqXbI/AAAAAAAAAAs/XfBIN1psfTg/s320/Khushwant-Singh1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; जब मुझे अमरिंदर सिंह की किताब ‘द लास्ट सनसेट : राइज एंड फॉल ऑफ द लाहौर दरबार’ (प्रकाशक रोली बुक्स) के विमोचन का निमंत्रण मिला तो मुझे आश्चर्य हुआ कि सिखों का यह नया इतिहासवेत्ता कौन है।&lt;br /&gt;वे पटियाला राजपरिवार के वंशज और पंजाब के भूतपूर्व मुख्यमंत्री नहीं हो सकते, क्योंकि वे सामान्यतया अपने नाम के साथ सम्मानसूचक उपाधियां जोड़ते थे। इसके अलावा वे पंजाब की गंदी राजनीति में इतने डूबे हुए हैं कि उनके पास 347 पृष्ठों की किताब के लिए शोध करने और लिखने का समय निश्चित ही नहीं रहा होगा।&lt;br /&gt;मेरी सारी शंकाओं का समाधान अगले दिन ही हो गया, जब कैप्टन अमरिंदर सिंह, जिनके साथ एक बहुत प्यारी लड़की थी और जिसे मैंने उनकी बेटी समझ लिया व प्रकाशक प्रमोद कपूर किताब की एक प्रति के साथ आ पहुंचे। उनसे मेरा पहला सवाल था कि क्यों पटियाला राजपरिवार का एक वंशज नाभा, जींद, फरीदकोट और कपूरथला समेत सभी फुल्कियां रियासतों के संग अंग्रेजों के साथ खड़ा होने को तैयार हो गया ताकि खुद को महाराजा रणजीत सिंह द्वारा निगल लिए जाने से बचा सके।&lt;br /&gt;रणजीत सिंह, जो हर उस जमीन के प्रति गहरी लालसा से भरे हुए थे, जिसे वे सिख साम्राज्य की वैध संपत्ति समझते थे। कैप्टन मुस्कराए और सिर्फ इतना ही बोले, ‘जवाब आपको किताब में मिल जाएगा।’ फिर मैंने उनसे पूछा कि किताब की सामग्री उन्हें कहां मिली? उन्होंने कहा, ‘कुछ साल ऐसे थे, जब मेरे पास करने को कुछ खास नहीं था। हमारे महल में एक विशालकाय लाइब्रेरी थी और चंडीगढ़ के पुस्तक संग्रह भी मेरी पहुंच से दूर नहीं थे।’&lt;br /&gt;उनके जाने के बाद मैं अध्याय-दर-अध्याय किताब को बांचता रहा। जाहिर था कि पूरी सामग्री को क्रमवार संजोने के लिए उनके पास सहायक थे, लेकिन लेखन पूर्णत: मौलिक था। सेना के किसी व्यक्ति से जैसी अपेक्षा की जा सकती है, उन्होंने रणजीत सिंह की फौज का खासा ब्योरा दिया था। पैदल सेना, घुड़सेना और तोपखाने से लैस इस फौज में, सिख, मुस्लिम, डोगरा और गुरखा सैनिक शामिल थे, जिनकी कवायदों के लिए यूरोपियन अफसर तैनात किए गए थे।&lt;br /&gt;उन्होंने एक संयुक्त पंजाबी लड़ाका फौज खड़ी करने में कामयाबी हासिल की थी, जो उस दौर में हिंदुस्तान में ब्रिटिश फौज के बाद दूसरी सबसे बड़ी सेना थी। मेरी जानकारी में किसी भी अन्य इतिहासकार ने इस विषय पर इतने विस्तार से नहीं लिखा है और न ही कोई अन्य इतिहासकार दो अंग्रेज-सिख युद्धों के दौरान हुई कई छोटी-छोटी लड़ाइयों के इतने ब्योरे दे पाया है। इस किताब में उन्होंने लड़ाई के मदान में उगने वाले दरख्तों तक के बारे में बताया है।&lt;br /&gt;लेकिन किताब में कुछ महत्वपूर्ण चूकें भी हैं। लेखक ने पंजाबी में रणजीत सिंह की जीवनी और हाल ही के अंग्रेजी के दो प्रकाशनों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। इनमें से एक किताब पटवंत सिंह द्वारा लिखी गई है और यह सिख दरबार का खालसा संस्करण है। दूसरी किताब है रणजीत सिंह के सबसे छोटे बेटे दलीप सिंह की नवतेज सरना द्वारा लिखी गई प्रामाणिक जीवनी।&lt;br /&gt;दलीप सिंह को वर्ष 1849 में ब्रिटिशों द्वारा सिख साम्राज्य का विलय कर लेने के साथ ही अपने संरक्षण में ले लिया गया था। बाद में उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। शराब और शबाब की आवारा जिंदगी बिताते हुए पेरिस में उनकी दुखद मौत हुई। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मुझ पर भी इतनी कृपा नहीं दिखाई कि वे इस विषय पर मेरी किसी किताब का संदर्भ देते। न तो उन्होंने सिख धर्म के इतिहास पर मेरी दो जिल्दों का जिक्र किया, न ही रणजीत सिंह पर मेरे द्वारा लिखी गई जीवनी का। ये दोनों ही किताबें अमेरिका, इंग्लैंड और भारत में शीर्ष प्रकाशकों द्वारा छापी गई हैं।&lt;br /&gt;उन्होंने अंग्रेज-सिख युद्धों के अंग्रेजी और पंजाबी में आए मेरे संस्करणों का भी कोई संदर्भ नहीं दिया। मुझे उनकी संदर्भ सूचियों और इंडेक्स तक में कोई जगह नहीं मिली है। मुझे यह दर्प था कि सिखों पर कोई भी किताब मेरी उपेक्षा करते हुए नहीं लिखी जा सकती है। वे मेरे इस दर्प को चूर-चूर करने में कामयाब हुए हैं।&lt;br /&gt;हारूकी मुराकामी&lt;br /&gt;मैंने तब तक हारूकी मुराकामी का नाम तक नहीं सुना था, जब एशियन बैंक मनीला में काम करने वाली ज्योत्सना वर्मा ने मुझसे पूछा कि क्या मैंने उनकी कोई किताब पढ़ी है? जब मैंने उनसे कहा कि मैंने तो मुराकामी का नाम तक नहीं सुना तो वह बोलीं, ‘आप कुछ चूक गए हैं। उन्हें पढ़ना एक शानदार अनुभव है। मैं आपको उनकी कोई किताब भेजूंगी।’ उसी शाम मुझे अपने अपार्टमेंट में ‘ब्लाइंड विलो, स्लीपिंग वुमेन’ (विंटेज इंटरनेशनल) शीर्षक से लघुकथाओं का एक संकलन मिल गया।&lt;br /&gt;एक दौर था, जब मैं जापानी फिक्शन की अंग्रेजी में अनूदित हर किताब पढ़ता था। मुझे स्वीकार करना होगा कि मैं उनमें से किसी भी उपन्यास या कहानी से पूरी तरह प्रभावित नहीं हुआ था। लेकिन मुराकामी को पढ़ना एक खोज की तरह था।&lt;br /&gt;एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद मैं उन्हें छोड़ नहीं पाया। उनकी कहानियों के बारे में सबसे अद्भुत बात यह है कि उनमें वाकई कोई संदेश या कुछ सिद्ध करने की कोशिश नहीं है। मैं एक-एक कर उनकी कहानियां पढ़ता चला गया। उनमें एक कहानी एक ऐसे व्यक्ति के बारे में थी, जो हर बार तूफान के बाद किसी चिड़ियाघर की यात्रा करने चला जाता है। तो क्या? मैंने खुद से पूछा।&lt;br /&gt;एक अन्य जोड़ा किसी नवजात कंगारू के बारे में पढ़ता है और यह तय करता है कि उन्हें उसके बड़ा होने और अपनी मां की थैली में चले जाने से पहले देख लेना चाहिए। एक माह बाद वे चिड़ियाघर की सैर करते हैं। नन्हा कंगारू विकसित कंगारुओं के साथ उछल-कूद कर रहा है और वह अपनी मां के थैले में जाकर अपने देखने वालों को उपकृत कर देता है। तो क्या? तीसरी कहानी एक युवा जोड़े की प्रेम और यौन ग्रंथियों के बारे में है, जो एक-दूसरे से विवाह नहीं करते, लेकिन बाद में पुन: एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं।&lt;br /&gt;इस तरह इस कहानियों को पढ़ते हुए अंतत: पाठक खुद को ही खीझ से भरा हुआ पाता है। यह सिलसिला एक कहानी से दूसरी कहानी, लोगों और जगहों के सचित्र ब्योरों के साथ जारी रहता है। अंतत: आप फर्नीचर से बंधे गैस के गुब्बारे जैसे हवा में लटके रह जाते हैं। बहरहाल मुझे हारूकी मुराकामी की जितनी भी किताबें मिल सकती हैं, मैं उन्हें पढ़ डालने की कोशिश करूंगा।&lt;br /&gt;भौंकना मना है&lt;br /&gt;बंता का अपनी बीवी बंतो से झगड़ा हो गया। बंता चीखा, ‘तुमने मुझे कुत्ता कहा?’ बंतो ने कोई जवाब नहीं दिया। बंता फिर चिल्लाया, ‘तुमने मुझे कुत्ता कहा?’ बंतो चुप रही। बंता तीसरी दफे चीखा, ‘तुमने मुझे कुत्ता कहा?’। बंतो ने चीखते हुए जवाब दिया, ‘नहीं कहा, पर अब तो भौंकना बंद करो!’(सौजन्य : जेपी सिंह काका, भोपाल।)&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7066465544984604668-4788245233408531596?l=fight4nation.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://fight4nation.blogspot.com/feeds/4788245233408531596/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_9155.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/4788245233408531596'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/4788245233408531596'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_9155.html' title='न मेरा नामोनिशां मिला'/><author><name>young voice</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02922572829347384095</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6JCGtlqXbI/AAAAAAAAAAs/XfBIN1psfTg/s72-c/Khushwant-Singh1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7066465544984604668.post-953011744686601753</id><published>2010-03-18T08:01:00.000-07:00</published><updated>2010-03-18T08:04:56.516-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='nupur joshi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='meri aawaz'/><title type='text'>पांव जो शिखर पर होकर भी होते हैं जमीं पर</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6JAm5kfgzI/AAAAAAAAAAk/VMDlAgdcju4/s1600-h/wefe.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5449989536104809266" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 219px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6JAm5kfgzI/AAAAAAAAAAk/VMDlAgdcju4/s320/wefe.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;नुपुर जोशी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रीति जिंटा आजकल सुर्खियों में हैं। महज आईपीएल के कारण ही नहीं, बल्कि अपने एक दोस्त की मदद करने के लिए भी। यह पहली बार नहीं है, जब प्रीति ने एक ऐसी चीज में हस्तक्षेप किया हो, जिसमें उनका गहरा विश्वास है। याद कीजिए, जब उन्हें धमकी भरे फोन आ रहे थे और उन्होंने पुलिस स्टेशन में इसकी शिकायत दर्ज कराई थी। तब मीडिया ने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री का एकमात्र ‘पुरुष’ कहा था। लेकिन उन्होंने कभी भी इसके बारे में बात नहीं की, ठीक वैसे ही, जैसे उन्होंने कभी इस बारे में कुछ नहीं बताया वह और उनके मित्र नेस वाडिया आखिरकार अलग क्यों हो गए।&lt;br /&gt;जो लोग प्रीति के करीबी हैं, वे शानदार अमरोही परिवार से उनके सालों पुराने रिश्तों को जानते होंगे। सुविख्यात फिल्म निर्देशक-लेखक कमाल अमरोही के पुत्र 66 वर्षीय शानदार अपनी बहन रुखसार और भतीजे के साथ पुश्तैनी संपत्ति के लिए लंबे समय से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे और प्रीति ने उनकी मदद करने का फैसला लिया। मामला तब बढ़ गया, जब शानदार ने प्रीति को अपना वारिस बताते हुए अपनी दौलत उनके नाम कर दी। उन्होंने कहा प्रीति उनके लिए बेटी की तरह हैं, जबकि उनकी खुद की कोई बेटी नहीं है। हमेशा की तरह प्रीति इस मामले में चुप रहीं और अमरोही परिवार की मदद करना जारी रखा। प्रीति ने कभी भी इंटरव्यू देने में जल्दबाजी नहीं दिखाई है। वो कहती हैं कि बताने के लिए कुछ भी नया नहीं होता। यह सच नहीं है, क्योंकि प्रीति उन चुनिंदा अभिनेत्रियों में से हैं, जो हमेशा किसी न किसी गतिविधि में शामिल रहती हैं। उन्होंने हाल ही में एक फिल्म में अतिथि भूमिका निभाते हुए एक नृत्य किया है। इसी के साथ प्रीति ने महिला सशक्तिकरण पर एक सेमिनार में भी हिस्सा लिया।&lt;br /&gt;प्रीति ने एक बार मुझसे बातचीत करते हुए फिल्मों में अपनी साहसी भूमिकाओं के बारे में बताया था। उन्होंने कहा कि वे ग्लैमर और चकाचौंध के लिए इस शो बिजनेस में नहीं आईं। वे मॉडलिंग की दुनिया में पर्याप्त ग्लैमर हासिल कर चुकी थीं और सच्चाई तो यह है कि वो मॉडलिंग में भी संयोग से ही पहुंची थीं। फिर मणिरत्नम ने उनसे दिल से में एक छोटी सी भूमिका निभाने को कहा। इस भूमिका के लिए प्रीति ने बस ये सोचते हुए हां कह दिया था कि मणिरत्नम उनके बुरे अभिनय से खीझते हुए अंतत: उन्हें बाहर कर देंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उन्हें अब भी नहीं पता कि कुंदन शाह ने उन्हें क्या कहना में क्यों लिया। वह एक मुश्किल रोल था और फिल्म ने बहस की स्थिति पैदा की। इसी दौरान तनुजा चंद्रा ने उन्हें संघर्ष में एक खोजी पत्रकार की भूमिका दी। प्रीति मानती हैं एक महिला और एक पेशेवर अदाकारा के रूप में यह उनके लिए बेहतर अनुभव था। उन्हें रितिक रोशन के साथ तीन फिल्मों मिशन कश्मीर, कोई मिल गया और लक्ष्य करने में बहुत मजा आया और यह इन फिल्मों में भी दिखता भी है। फरहान अख्तर ने जब उन्हें दिल चाहता है ऑफर की थी तो उन्हें समझ नहीं आया था कि तीन दोस्तों की कहानी में वे क्या करेंगी, लेकिन वो फिल्म उनके लिए अब तक का सबसे रोचक अनुभव है।&lt;br /&gt;चूंकि हनी ईरानी ने फिल्म क्या कहना लिखी थी, इसलिए उनकी अरमान के लिए हां कहने में प्रीति ने एक मिनट का समय भी नहीं लिया, जबकि वह एक नकारात्मक भूमिका थी। करन की दोस्ती के चलते कल हो न हो को वे अपने लिए खास मानती हैं। उनके पास इस फिल्म से जुड़ी कई अच्छी यादें हैं। लेकिन अपने कॅरियर का सर्वोच्च शिखर प्रीति यश चोपड़ा की वीर जारा को मानती हैं। उनके मुताबिक ये उनके लिए लाइफटाइम रोल था और इसके बाद काफी दिनों तक वे जहां भी जातीं, उन्हें जारा के नाम से ही पुकारा जाता रहा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7066465544984604668-953011744686601753?l=fight4nation.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://fight4nation.blogspot.com/feeds/953011744686601753/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_7618.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/953011744686601753'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/953011744686601753'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_7618.html' title='पांव जो शिखर पर होकर भी होते हैं जमीं पर'/><author><name>young voice</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02922572829347384095</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6JAm5kfgzI/AAAAAAAAAAk/VMDlAgdcju4/s72-c/wefe.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7066465544984604668.post-5483300420160705558</id><published>2010-03-18T07:50:00.000-07:00</published><updated>2010-03-18T07:57:01.214-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='prretish nandi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='meri aawaz'/><title type='text'>भारत का आश्चर्यलोक</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6I-nyyLp6I/AAAAAAAAAAc/d1b6A78KXFQ/s1600-h/PRITISH-NANDY1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5449987352439793570" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 288px; CURSOR: hand; HEIGHT: 224px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6I-nyyLp6I/AAAAAAAAAAc/d1b6A78KXFQ/s320/PRITISH-NANDY1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;प्रीतिश नंदी&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;आश्चर्यलोक में एलिस की मुश्किल क्या थी? उसकी मुश्किल यह थी कि वह तय नहीं कर पा रही थी क्या असली है और क्या नहीं। वह एक बहुत सुंदर और सम्मोहक संसार था, जहां हर वो चीज, जो असली नजर आती थी, संभवत: असली नहीं थी और अधिकांश चीजें, जो असली नहीं मालूम होती थीं, वे पूरी तरह असली थीं। ऐसा प्रतीत होता है कि इन दिनों हम भी ऐसे ही आश्चर्यलोक में रह रहे हैं, जहां कोई भी चीज दरअसल वैसी नहीं है, जैसी वह दिखाई देती है।&lt;br /&gt;आइए कुछ उदाहरणों पर गौर करते हैं। हम मुद्रास्फीति के भयावह प्रसार के दौर से गुजर रहे हैं, जिसने सबसे ज्यादा खाद्य सामग्रियों की कीमतों पर असर डाला है। जैसा कि हम सभी जानते हैं, 40 प्रतिशत भारतीयों को तमाम प्रयासों के बावजूद बहुत मुश्किल से ही भोजन मिल पाता है। इनमें से कई तो भूखे पेट सोने को विवश हैं। उनकी स्थिति अब बद से बदतर हो गई है। यदि पलायन के आंकड़ों पर यकीन करें तो उनमें से अधिकांश लोग नौकरी और रोजी-रोटी की तलाश में अपने घर छोड़कर शहरों की ओर जा रहे हैं ताकि उन्हें कुछ भी ऐसा काम मिल सके, जिससे वे दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर सकें। फिर भी जिस बजट को लेकर तारीफों के इतने पुल बांधे गए, जिसने विदेशी पूंजी बाजार को गरमा दिया और मीडिया जिसके गुणगान में बावला हो गया, उस बजट ने कीमतों को कम करने के लिए कुछ नहीं किया।&lt;br /&gt;सच्चाई तो यह है कि बजट ने ठीक इसका उल्टा काम ही किया है। इसने ईंधन की कीमतें भी बढ़ा दीं। कोई नौसिखिया अर्थशास्त्री भी आपको यह बता देगा कि ईंधन की कीमत बढ़ने से मुद्रास्फीति की स्थिति और भी भयावह हो जाएगी। हो सकता है कि मैं अनाड़ी होऊं, लेकिन मुझे अभी तक इस बजट में ऐसा कुछ भी नहीं दिखाई दिया, जो भारत को प्रगति की दिशा में लेकर जाता हो, जैसा कि दावा किया जा रहा है। मुझे तो केवल यही दिखाई दे रहा है कि जो आज की सबसे महत्वपूर्ण और गंभीर जरूरतें हैं, उन्हें भयावह तरीके से नजरअंदाज किया गया है। कोई भी मुल्क, यहां तक कि दुनिया का सबसे अमीर मुल्क भी खाद्य पदार्थो की कीमतों में 18 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ नहीं चल सकता।&lt;br /&gt;अर्थव्यवस्था पर एक नजर डालते हैं। मंदी बहुत भयानक थी, बावजूद इसके कोई इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। सरकार अब तक मंदी से इनकार कर रही है, लेकिन बावजूद इसके मंदी की मार हम पर बदस्तूर जारी है। लेकिन इस मंदी की वजह से हमारी कैबिनेट 2.35 खरब डॉलर का गोर्शकोव सौदा पास करने से नहीं रुकती, जिसके बारे में हम सभी जानते हैं कि यह अब तक का सर्वाधिक मूर्खतापूर्ण और महंगा रक्षा सौदा है। इस खर्चे के कारण हमारा रक्षा आपूर्ति उद्योग मंदी से नहीं उबर पाएगा।&lt;br /&gt;यह पैसा सीधे उन लोभी रूसियों के हाथों में जा रहा है, जिन्होंने इस पुराने जंगी बेड़े की कीमत वर्ष 2004 के 9.74 करोड़ डॉलर से बढ़ाकर इतनी ज्यादा कर दी है। हम इस धौंस के आगे क्यों झुक गए? कोई भी ठीक-ठीक नहीं जानता। लेकिन ये एक ऐसा खिलौना है, जो हमारे पास होना ही चाहिए ताकि हम पूरी दुनिया के सामने अपनी शेखी बघार सकें।&lt;br /&gt;कृषि मंत्री अपने प्रशासकीय कौशल के लिए जाने जाते हैं। इसके बावजूद हर साल कृषि का उत्पादन घटता चला जाता है। हर साल और अधिक किसान आत्महत्या करते हैं। सिर्फ इसलिए क्योंकि अब वे और बर्दाश्त कर सकने की स्थिति में नहीं हैं। मानसून समय पर नहीं आता। किसानों को अपने उत्पादन की सही कीमत नहीं मिल पाती। इसके बावजूद दिलचस्प बात तो ये है कि खाद्य पदार्थो की कीमतें लगातार बढ़ती रहती हैं, जिससे मध्यवर्ग के एक समूह को मुनाफा होता है।&lt;br /&gt;यदि कोई एक चीज वर्तमान सरकार को गंभीरता से परेशान कर रही है तो वह है खाद्य पदार्थो के मोर्चे पर हो रहा भयावह कुप्रबंधन। इसके बारे में कुछ करने की बजाय हमें सरकार के ये प्रवचन सुनने को मिलते हैं कि किस तरह शक्कर (जो 50 रुपए की एक किलो आती है) सेहत के लिए बुरी है और हमें इसका इस्तेमाल कम कर देना चाहिए। आईपीएल तमाशा, जिसकी ब्रांड कीमत 19 हजार करोड़ रुपए है, कृषि मंत्री की ओर से हमारे देश को एक नायाब तोहफा है। यह तोहफा उन तीन वर्षो के दौरान दिया गया है, जिस समय किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याएं चरम पर हैं।&lt;br /&gt;हम आर्थिक सुधारों की बाबत काफी कुछ सुन चुके हैं, जबकि सरकार के लिए जरूरत इस बात की है कि वह उन जगहों पर व्यवसायों को समाप्त करे, जहां उनकी आवश्यकता नहीं है। सरकार तो सार्वजनिक उपक्रमों में निवेश को समाप्त करने में भी सुस्त ही साबित हुई, जबकि इसी मुद्दे पर उन्होंने कभी वाम मोर्चे से लड़ाई लड़ी थी। सबसे सरल उदाहरण तो नई एयर इंडिया की तड़क-भड़क और उसका नया चमकीला लोगो है। एक महत्वपूर्ण संसदीय समिति ने एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के विलय की आलोचना की है। दोनों के विलय के चलते 5500 करोड़ का घाटा हुआ है। पहले की स्थिति से तुलना कीजिए। विलय से पहले इंडियन एयरलाइंस को महज 200 करोड़ और एयर इंडिया को 400 करोड़ का नुकसान हुआ था। क्या आप इससे हास्यास्पद वित्तीय जोड़ की कल्पना कर सकते हैं, जहां 600 करोड़ रुपए का घाटा रातोंरात 5500 करोड़ हो जाता है? क्यों नहीं इसमें से थोड़े निवेश को समाप्त कर दिया जाता और मंत्रालय की बजाय वास्तविक पेशेवरों को व्यवसाय करने दिया जाता?&lt;br /&gt;कई ऐसे मामले हैं, जहां हम किसी समस्या को किसी चमकदार, बेतुके स्वांग से बदल देते हैं। हमारे पास खाने को भोजन नहीं है? कोई बात नहीं, हम आपके लिए एक सनसनीखेज क्रिकेट तमाशे का आयोजन कर देंगे, जिसमें खूब सारे फिल्मी सितारे और सुंदर चीयरलीडर हैं। आप माओवादियों के 20 प्रदेशों में फैल जाने की खबर से चिंतित हैं, जो जेहादियों से ज्यादा हत्याएं कर चुके हैं?&lt;br /&gt;कोई फिक्र नहीं, हम आपको 2.35 खरब डॉलर का पुराना रूसी जंगी जहाज खरीद देंगे। आपके शहर प्रवासियों के दबाव से जूझ रहे हैं, क्योंकि कृषि अब मुनाफे का सौदा नहीं रहा? निश्चिंत हो जाइए, हम आपके लिए अनोखे पुल, फ्लाइओवर और वॉकवे बनवा देंगे, जिन पर कभी कोई नहीं चल सकेगा। आपको अपनी तमाम शिक्षा के बावजूद कोई रोजगार नहीं मिलता? कोई हर्ज नहीं, हम लोकसभा में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का वादा करते हैं। आतंकी हमलों की बढ़ती घटनाओं से आप डरे हुए हैं? बेफिक्र हो जाइए, हम आपको देंगे एक पूर्ण भारत-अमेरिका परमाणु सौदा। शहरों में सार्वजनिक परिवहन समाप्ति की कगार पर है? कोई दिक्कत नहीं, हम मुख्य जगहों पर हेलीपैड बना रहे हैं।&lt;br /&gt;यही वह आश्चर्यलोक है, जिसमें एलिस ने स्वयं को घिरा पाया था।&lt;br /&gt;लेखक वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार हैं। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7066465544984604668-5483300420160705558?l=fight4nation.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://fight4nation.blogspot.com/feeds/5483300420160705558/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_18.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/5483300420160705558'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/5483300420160705558'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post_18.html' title='भारत का आश्चर्यलोक'/><author><name>young voice</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02922572829347384095</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6I-nyyLp6I/AAAAAAAAAAc/d1b6A78KXFQ/s72-c/PRITISH-NANDY1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7066465544984604668.post-9012160863989879766</id><published>2010-03-18T07:46:00.000-07:00</published><updated>2010-03-18T07:48:54.482-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='aashutosh'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='meri aawaz'/><title type='text'>महिला बिल और सोनिया का आम आदमी प्रेम</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6I9AsxNmdI/AAAAAAAAAAU/4CsJfS6lLB4/s1600-h/ashutoshibn7_180.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5449985581298588114" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 180px; CURSOR: hand; HEIGHT: 175px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6I9AsxNmdI/AAAAAAAAAAU/4CsJfS6lLB4/s320/ashutoshibn7_180.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;आशुतोष &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;महिला आरक्षण बिल में बड़ी आग है। संसद हो या फिर सड़क चर्चा हर जगह गरम है। विरोधियों को ये पच ही नहीं रहा है कि महिलाएं किचन से निकल कर कैबिनेट तक पर हावी हो जाएं और मर्द बेचारे हवा फांकते रह जाएं। उधर समर्थकों को नई क्रांति दिख रही है। इस बहस में सोनिया गांधी बल्ले-बल्ले हैं। उनके लिये तो पार्टी का नया वोटबैंक तैयार हो रहा है।&lt;br /&gt;महिलाओं को वोटबैंक के तौर पर कभी हिंदुस्तान में देखा ही नहीं गया। जातियों पर डोरे डाले गये। धार्मिक गुटों को अपना बनाने के लिये रोटीयां बेली गईं लेकिन औरत वो तो अबला है, बेचारी कहां जायेगी। सोनिया को लगा कि इस तबके को भुनाया जा सकता है तो राष्ट्रपति चुनने के लिये तमाम हैवीवेट राजनेताओं के बीच उन्हें प्रतिभा पाटिल नजर आईं और लोकसभा अध्यक्ष के तौर पर मीरा कुमार। और जब महिला बिल पर कांग्रेस के भारी भरकम नेताओं की सांस फूलने लगी तो सोनिया ने साफ कहा बिल राज्यसभा से पास करवावो या फिर रास्ता नापो।&lt;br /&gt;बात सिर्फ महिलाओं तक नहीं है। मनमोहन और सोनिया की जुगलबंदी कांग्रेस नाम की लंगड़ी पार्टी को अपने दोनों पैरों पर खड़ा करने की जुगाड़ मे हैं। इसके लिये पार्टी की काफी बारीकी से 'री-ब्रांडिग' की जा रही है। बिलकुल उसी तरह जैसे इंग्लैंड की लेबर पार्टी ने पहले नील किनाक और बाद मे टोनी ब्लेयर के नेत्तृत्व में लेबर की 'पोजीशनिंग' की। और लेबर पार्टी 'न्यू लेबर' बन गयी। जो पार्टी ब्रिटेन में समाजवादी और ट्रेड युनियन नीतियों के लिये जानी जाती थी उसे 'लेफ्ट' से खिसका कर 'सेंटर' मे लाया गया। लेबर पार्टी ने 1995 में अपने संविधान की धारा 4 मे संशोधन कर 'पब्लिक सर्विस के नेशनलाइजेशन' यानी राष्ट्रीयकरण के अपने मूलभूत सैद्धांतिक वादे को ही हटा दिया। यानी पार्टी अब सरकार मे आने के बाद नेशनलाइजेशन के लिये प्रतिबद्द नहीं है। पार्टी ने बदलते समय के मुताबिक अपने सोशल एजेंडे को बदला और बाजारबाद के करीब हो गयी। 1995 में किये गये इस बदलाव ने पार्टी को ब्रिटेन के मध्यवर्ग का चहेता बना दिया। और इसी मिडिल क्लास के सहारे लेबर ने 1997 मे ऐतिहासिक जीत हासिल की।&lt;br /&gt;लेबर पार्टी ने 1977 की करारी हार के बाद काफी बुरे दिन देखे थे। उसका वोट प्रतिशत काफी घट गया था। वैसे ही जैसे 1996 की हार के बाद कांग्रेस के खत्म होने की भविष्यवाणियां होने लगी थी। लगातार चुनावों में हार किसी को भी तोड़ने के लिये काफी था लेकिन 2004 की अप्रत्याशित जीत ने उसमें संजीवनी का संचार किया और कांग्रेस के रणनीतिकारों ने एनडीए की हार से सबक लिया। जीडीपी और सेंसेक्स मे उछाल शाइंनिंग इंडिया का खूबसूरत एहसास तो देता है लेकिन इससे जीतने लायक वोट नहीं मिलते। वाजपेयी सरकार ने विकास के स्तर पर कतई खराब काम नहीं किया था। विकास दर लगातार 6 फीसदी बनी रही। उनकी गलती इतनी सी थी कि वो अपने सोशल एजेंडे को नहीं बदल पायी और न ही आर्थिक सुधारों को गांव, देहात और गरीब से जोड़ पायी।&lt;br /&gt;कांग्रेस ने बीजेपी की गलतियों से सीखा। और शाइनिंग इंडिया के समक्ष आम आदमी का नारा दिया और सरकार में आने के बाद नरेगा और किसानों की कर्ज माफी पर ध्यान दिय़ा। और इसका फायदा भी उसे मिला 2009 में। चुनाव जीतने के बाद उसने इस एजेंडे को और गति दी। तीन स्तर पर योजना बनी। पहला, वोटबैंक पॉलिटिक्स के मद्देनजर मुस्लिमों को लुभाने के लिये रंगनाथ मिश्र कमेटी की सिफारिश के आधार पर अल्पसंख्यक तबके को आरक्षण की वकालत, बटला हाउस एनकाउंटर पर सवाल खड़े करने की कोशिश और बजट मे अल्पसंख्यक तबके के लिये अलग से वित्तीय प्रावधान। लालू मुलायम का साथ छोडना इस योजना की ही कड़ी है। दूसरे, पार्टी को गांव देहात और दरिद्र नारायण के करीब लाने के लिये राहुल गांधी का गरीबों के घर रात गुजारना, दलित बस्तियों में रहना, उनके दुख दर्द सुनना आदि आदि। और तीसरे सरकारी स्तर पर आर्थिक सुधार के एजेंडे को मानवीय चेहरा देने की कोशिश करना।&lt;br /&gt;सरकार ने अपने 2010 के बजट मे सोशल सेक्टर मे वित्तीय खर्च मे 37 फीसदी की बढ़ोत्तरी की है तो महिला और बाल विकास मद में 50 फीसदी का इजाफा। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य पर जानबूझकर खासा ध्यान दिया जा रहा है। बेरोजगारी दूर करने के लिये नरेगा सरकार की कारगर स्कीम पहले से ही थी और अब उसपर और भी जोर दिया जा रहा है। शिक्षा मे आमूलचूल बदलाव करने में कपिल सिब्बल जुटे हैं। कपिल एक तो कक्षा दस और बारह के पाठ्यक्रम और परीक्षा को आसान बना कर शहरी मध्यवर्ग को अपना बनाने मे लगे हैं तो देहात को ध्यान में रख 14 साल तक की उम्र तक के बच्चों के लिये शिक्षा को मुफ्त और अनिवार्य करने का जाल बुना जा रहा है। अशिक्षित महिलाओं को साक्षर बनाने के लिये 'नेशनल लिट्रेरी मिशन' का नाम बदलकर 'साक्षर भारत' कर दिया गया है। स्वास्थ्य के मुद्दे पर हर जिले मे हेल्थ सर्वे और नरेगा के तहत 15 दिन से ज्यादा काम करने वालों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत लाना पार्टी की 'री-ब्रांडिग स्ट्रेटजी' का ही हिस्सा है। साथ ही गांव देहात में डाक्टरों की मौजूदगी को अनिवार्य बनाने का भी कार्यक्रम जारी है। ऐसे में महिला आरक्षण को अकेले देखना गलत होगा। सोनिया टोनी ब्लेयर के रास्ते पर हैं। ब्लेयर 1997 चुनाव के पहले कहते थे - प्रधानमंत्री बनने का बाद वो तीन चीज करेंगे - शिक्षा, शिक्षा और शिक्षा। सोनिया भी यही कह रही हैं आम आदमी, आम आदमी और आम आदमी। बस एक ही चिंता है कहीं बीच मे मंहगाई न खड़ी हो जाये। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7066465544984604668-9012160863989879766?l=fight4nation.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://fight4nation.blogspot.com/feeds/9012160863989879766/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/9012160863989879766'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/9012160863989879766'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='महिला बिल और सोनिया का आम आदमी प्रेम'/><author><name>young voice</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02922572829347384095</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6I9AsxNmdI/AAAAAAAAAAU/4CsJfS6lLB4/s72-c/ashutoshibn7_180.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7066465544984604668.post-2238616241897068819</id><published>2010-03-18T07:40:00.000-07:00</published><updated>2010-03-18T07:45:52.447-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='meri aawaz'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='saleem khan'/><title type='text'>दुनिया चाहे तसलीमा दीदी को वेश्या कहे लेकिन मैं उन्हें अपने घर में रखूंगा क्योंकि ... weeping crocodiles</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6I8PRSTyYI/AAAAAAAAAAM/bhTbzrdoipc/s1600-h/saleem.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5449984732107622786" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 158px; CURSOR: hand; HEIGHT: 220px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_hUau3adFp8c/S6I8PRSTyYI/AAAAAAAAAAM/bhTbzrdoipc/s320/saleem.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दुनिया तसलीमा दीदी को लेडी रूश्दी कहती है उनका नाम उनके बराबर रखती है। उन्हें मक़बूल फ़िदा के समान समझती है । उन्हें अपनी यौनेच्छा का सम्मान करने के कारण वेश्या तक समझ लिया जाता है जबकि हक़ीक़त यह है कि उनका न तो इन दोनों मर्दों से कोई मुक़ाबला है और न ही उन्हें वेश्या कहा जा सकता है।&lt;br /&gt;भाई उमर कैरानवी आपके दिए लिंक को देखा । &lt;a href="http://janatantra.com/2010/02/28/taslima-on-husain-and-salman-rushdi/"&gt;http://janatantra.com/2010/02/28/taslima-on-husain-and-salman-rushdi/&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;तसलीमा नसरीन उन औरतों में से हैं जो ‘शोहरत पाने के लिए कपड़े तक उतार सकती हैं भले ही ये कपड़े किसी के भी हों ।&lt;br /&gt;उनके द्वारा किसी के भी नंगे चित्र बनाने की बात कहा जाना खुद उनका इक़बालिया बयान है । ऐसे में उनके विचारों से कौन सहमत हो सकता है और कौन उनके विचारों का प्रसार कर सकता है ?&lt;br /&gt;सिवाय उस आदमी के जो अपनी मां बहनों और आराध्यों को भी नंगा करके उनके सामने खड़ा करने के लिए तैयार हो ताकि तसलीमा जी अपने जी के अरमान पूरे कर सकें । ज़ाहिर है बंग्लादेश के लोग इस बेग़ैरती के लिए तैयार नहीं हुए और उन्हें निकाल बाहर किया । फिर उन्होंने अपनी बेग़ैरती के विषबीजों को बोने के लिए भारत को उपयुक्त समझा लेकिन उन्हें यहां से भी जाना पड़ा क्योंकि मेरे महान भारत के भी अक्सर लोगों की ग़ैरत और ज़मीर ज़िन्दा है । कुछ मुर्दा ज़मीरों ने उन्हें रोकने की भी कोशिश की लेकिन उनकी चल न सकी । वे लोग अब भी यदा कदा आवाज़ उठाते रहते हैं । इनमें बात को विचारे बिना गीदड़ों की तरह रोने वाले भी कुछ लोग ‘शामिल हो जाते हैं ।&lt;br /&gt;ये वे लोग हैं जो मुसलमानों की फ़ज़ीहत का कोई भी मौक़ा गंवाना नहीं चाहते भले ही उनकी खुद की भी इज़्ज़त ( ? ) की अर्थी उठ जाए , जोकि मुर्दा तो पहले से ही है ।&lt;br /&gt;तसलीमा जी सलमान रूश्दी के कमीनेपन की क़लई खोलकर उन सभी लोगों को नंगा करने में कामयाब हो गई हैं जो अतीत में अपनी कुंठाओं के चलते रूश्दी की हिमायत करते थे या अब भी करते हैं । यह अब साबित हो गया है कि स्वतन्त्रता की अभिव्यक्ति की छतरी का लाभ उठाने वाले रूश्दी को सबको इस अधिकार के न मिल पाने का कोई मलाल नहीं है । बल्कि उसने तो अपने स्टाफ़कर्मी की किताब को प्रकाशिज होने से रूकवाकर दूसरों से यह छीनने का ही काम किया है । प्रकाशक ने भी उनका सहयोग करके यह साबित कर दिया है कि उन्होंने भी अपना भगवान ‘ लक्ष्मी ‘ को ही बना रखा है । इसके बावजूद रूश्दी तसलीमा जी से फिर भी बेहतर है क्योंकि उनके अन्दर ग़लती करने के बाद क्षमा मांगने का भी गुण है । जबकि तसलीमा ग़लती करके उसपर अड़ने में उनसे कहीं आगे हैं ।&lt;br /&gt;तसलीमा जी की आपत्ति ठीक है उनका नाम रूश्दी के साथ जोड़ना हरगिज़ इन्साफ़ नहीं है । तसलीमा जी को इस बात पर भी आपत्ति है कि सलमान रूश्दी को अपनी अमीरी के बल पर लड़कियां भोग कर छोड़ देने पर समर्थ पुरूष समझा जाता है । जबकि वे भी मर्दों की तरह कुछ कर दिखाना चाहती हैं तो उन्हें वेश्या कहा जाता है । इसमें तो समाज की मजबूरी साफ़ है । जिस काम को जिस ‘शब्द से जाना जाता है समाज वही शब्द तो इस्तेमाल करेगा । वह तसलीमा जी के लिए तो अपना ‘शब्दकोष बदलेगा नहीं।&lt;br /&gt;लेकिन इसके बावजूद भी उन्हें वेश्या कहना ठीक नहीं । वेश्याओं को इस पर आपत्ति हो सकती है। वेश्या इस दलदल में मजबूरीवश हैं । वे तो अनैतिक संबन्धों से कोई सच्चा सहारा मिलते ही तौबा कर लेती हैं । इसके लिए न तो वे कोई फ़लसफ़ा घड़ती हैं और न ही उनके दिल में किसी आम या ख़ास आदमी के नंगे चित्र बनाने की ख्वाहिश या हिम्मत है । अपने अपने धर्मजनों की इज़्ज़त भी वे सामान्य रीति से ही करती हैं । तसलीमा जी के विचार जानकर वे भी अपने पास बैठाना पसन्द न करेंगी ।तसलीमा जी का यह कहना भी ग़लत है कि रूश्दी के ऐब पर उसे कोई बुरा नहीं समझता । अगर उनकी उठ बैठ ज़िन्दा ज़मीरों में होती तो उन्हें पता चलता कि 153 करोड़ मुसलिमों के साथ हर वह आदमी उनके ऐब पर उन्हें बुरा ही कहता है जो किसी नैतिकता और धर्म नियम का पाबन्द है । मक़बूल फ़िदा को खदेड़ भगाने वाले भी तसलीमा की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाते देखे जा सकते हैं। यह उनकी सियार मनोवृत्ति का ही परिचायक है ।&lt;br /&gt;अपने आराध्य ठहरा लिये गये देवी देवताओं के नग्न यौनांगों की मूर्तियां हर नगर के चैराहों पर स्थापित करने वाले कौन हैं? मक़बूल फ़िदा या फिर वे खुद ? आप अपने देवी देवताओं को जिस रीति से सम्मान देंगे दूसरा भी उसी का तो अनुकरण करेगा । पोस्टर कैलेंडर और सामान की पैकिंग पर उनके फ़ोटो छापने वाला कौन है ? सामान प्रयोग करके इन चित्रों को खुद इनके पुजारी इन्हें कहां फेंकते हैं । यह सभी जानते हैं। जबकि आप मुसलमानों को न तो अपने बुज़ुर्गों के नंगे चित्र बनाते पाएंगे और न ही उनके धार्मिक चिन्हों को कूड़े के ढेर पर पड़ा हुआ देख सकते ।&lt;br /&gt;यही वजह है कि मक़बूल फ़िदा मुसलिम बुजुर्गों का सम्मान ठीक उसी तरह करते हैं जैसे कि मुसलिम करते हैं और वे हिन्दू देवी देवताओं के प्रति अपना अनुराग ठीक वैसे ही प्रदर्शित करते हैं जैसेकि उन्होंने खुद हिन्दुओं को करते देखा । यह एक स्वाभाविक आचरण है । जबकि लेखिका नसरीन उनकी तरह इस मर्यादा का पालन करने से भी इनकार कर रही हैं तो उनका नाम उनके साथ रखना उचित भी नहीं है । इस सबके बावजूद मक़बूल फ़िदा को हिन्दू देवी देवताओं के नग्न चित्र नहीं बनाने चाहिये थे क्योंकि इसलाम अनावश्यक चित्र बनाने व फितना फैलाने से रोकता है । उनके कृत्य की हम भतर्सना करते हैं । मज़हब के नाम पर उन्माद फैलाने वालों और क़ानून अपने हाथ में लेने वालों की भी हम निन्दा करते हैं । ये लोग धर्म के मर्म से कोरे लोग हैं । इसलाम का अर्थ है ‘ ‘शान्ति ‘। समाज की ‘शान्ति भंग करने वालों का ‘शुमार नादानों और ज़ालिमों में तो हो सकता है लेकिन उन्हें खुदा का प्यारा बन्दा नहीं माना जा सकता और न ही उनके कामों के लिए इसलाम को दोष दिया जा सकता है । इसलाम हर ‘शख्स को उसकी अच्छी या बुरी मान्यताओं के साथ जीने की गारंटी देता है । इसलाम के न मानने की वजह से उनका यह हक़ उनसे कोई नहीं छीन सकता । वो जैसी भी हों और चाहे हम उनसे सहमत न भी हों । तब भी हम चाहते हैं कि उन्हें जीने की आज़ादी और हिफ़ाज़त मिले । अगर सरकार इजाज़त दे तो मैं खुद उन्हें अपने घर में रखना चाहूंगा लेकिन एक बहन की तरह । ताकि वे कुछ दिन कुछ ज़िन्दा ज़मीर लोगों के साथ रहकर इसलाम को उसके कल्याणकारी रूप में पा सकें । इसलाम ही वह ‘शान्ति का स्रोत है जो उनकी प्यासी आत्मा को तृप्त और व्याकुल मन को ‘शांत कर सकता है । आमीनहम सच्चे मालिक प्रभु परमेश्वर अल्लाह से उनके अपने और सभी पाठकों के लिए पूर्ण सन्मार्ग प्रेरणा और लोक परलोक में सफलता की दुआ करते हैं । वह मालिक हमें अपनी ‘शक्ति से एक और नेक बनाये। इसी के साथ हम तसलीमा जी से विनती करेंगे कि दूसरे लोग भी उनकी ही तरह इनसान हैं । उनकी ही तरह वे भी दिल और भावनाएं रखते हैं । अगर आप चाहती हैं कि कोई आपका दिल न दुखाए तो आप भी दूसरों के जज़्बात का ख़याल रखें । सामान्य शिष्टाचार के पालन मात्र से ही आपकी सारी समस्या का ख़ात्मा हो जाएगा । अगर धार्मिक कट्टरता बुरी है तो नास्तिक कट्टरता भी निन्दनीय है । बेशक आप समाज में परिवर्तन लाएं लेकिन परिवर्तन के नाम पर पतन तो न लाएं ।&lt;br /&gt;’आप किसी का भी नंगा चित्र बना सकती हैं ‘ आपका ये दावा भी झूठा दावा है जिसे आप हरगिज़ पूरा नहीं कर सकतीं । चहे खुद आपको यक़ीन न आये लेकिन सच यही है ।वर्ना अगर आप अपने दावे में सच्ची हैं तो अपनी मां का नंगा चित्र बनाकर दिखायें । खूब बिकेगा । आपका दावा भी सच्चा हो जाएगा और आपकी आर्थिक तंगी भी दूर हो जाएगी । आपको इस हिम्मत के बदले में अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी नवाज़ा जाएगा ।क्या अपने दावे को सच करने हिम्मत है आपमें ?बढ़िए आगे बढ़िए । अब आपके क़दम क्यों लड़खड़ा रहे हैं ?दूसरों के आदरणीय लोगों के साथ तो आप बेशक कुछ भी कर सकती हैं लेकिन अपनी मां के साथ ...?सोचकर ही आपके बदन के रोंगटे खड़े हो गए ?स्त्री ‘शरीर पिपासु आपको पहले से ही घेरे बैठे हैं ।&lt;br /&gt;हम मुसलमानों से भी कहना चाहेंगे कि आज उनके अमल पूरी तरह उनकी धार्मिक किताब के मुताबिक़ नहीं हैं जिससे लोगों को इसलाम के समझने और मानने में भारी दिक्क़त हो रही है और इससे स्वार्थी तत्व लोगों को भारी मात्रा में आसान शिकार मिल रहे हैं । अपना इल्म बढ़ाएं और अपना आचरण सुधारें । लोगों के लिए ‘शान्ति और रहमत का ज़रिया बनें । खुद को साक्षात इसलाम बना लें । भ्रम की धुंध स्वतः समाप्त हो जाएगी । अन्यथा मुसलमान मानवता के मुजरिम ठहरेंगे और उस परम प्रधान का दण्ड उनपर लागू हो जाएगा । तबाही से खुद भी बचें और दूसरों को भी बचायें । संवाद बढ़ाएं और प्यास मिटाएं।&lt;br /&gt;अब बताइये कि कौन हम से सहमत है और कौन दीदी तसलीमा&lt;br /&gt;से ? &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7066465544984604668-2238616241897068819?l=fight4nation.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://fight4nation.blogspot.com/feeds/2238616241897068819/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/weeping-crocodiles.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/2238616241897068819'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7066465544984604668/posts/default/2238616241897068819'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://fight4nation.blogspot.com/2010/03/weeping-crocodiles.html' title='दुनिया चाहे तसलीमा दीदी को वेश्या कहे लेकिन मैं उन्हें अपने घर में रखूंगा क्योंकि ... weeping crocodiles'/><author><name>young 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